बात 1957 की है. दूसरी लोकसभा में भारतीय जन संघ के सिर्फ़ चार सांसद थे. इन सासंदों का परिचय तत्कालीन राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन से कराया गया तब राष्ट्रपति ने हैरानी व्यक्त करते हुए कहा कि वो किसी भारतीय जन संघ नाम की पार्टी को नहीं जानते. अटल बिहारी वाजपेयी उन चार सांसदों में से एक थे I भारतीय जन संघ से भारतीय जनता पार्टी और सांसद से देश के प्रधानमंत्री तक के सफ़र में अटल बिहारी वाजपेयी ने कई पड़ाव तय किए हैं.
वाजपेयी ने पहली दफा ही सदन के अंदर अपना लोहा मनवा दिया था Iभारतीय राजनीति में 60 के दशक में चीन के आक्रमण के बाद पंडित नेहरू को संसद के अंदर जिस तेजस्वी युवा की दहाड़ ने निरुत्तर किया था और जिन्हें नेहरू ने भारत का भविष्य का प्रधानमंत्री बताया था- वह अटल बिहारी वाजपेयी पूरे 50 वर्ष भारतीय राजनीति में सर्वमान्य और लोकप्रिय व्यक्तित्व बने रहे। लगभग एक दशक से मौन की स्थिति में अस्वस्थ वाजपेयी आज बंगाला क्रमांक 6 A कृष्णा मेनन मार्ग , दिल्ली में सवास्थ्य लाभ ले रहे है |
1957 के सामान्य-निर्वाचन में बलरामपुर (उ.प्र.) क्षेत्र से जीतकर जब अटल जी पहली बार लोकसभा पहुंचे तो सदन में पहली बार बोलते ही प्रधानमंत्री नेहरू जी उनकी वक्तृता से इतने प्रभावित हुए कि जब जॉन फिट्जराल्ड कैनेडी अमरीका के राष्ट्रपति के चुनाव में खड़े हुए, तो उनके साथ वहां की निर्वाचन-प्रणाली को समझने के लिए उन्होंने अपनी पार्टी के किसी सदस्य को भेजने के बजाय जनसंघ के अटल जी को भेजा। शायद नेहरू जी को तभी उस युवक अटल बिहारी वाजपेयी में भारत के भावी प्रधानमंत्री बनने की योग्य-क्षमता की झलक मिल गयी थी। अटलजी का व्यक्तित्व बहुत ही मिलनसार है। उनके विपक्ष के साथ भी हमेशा संबंध मधुर रहे। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में विजयश्री के साथ बांग्लादेश को आजाद कराकर पाक के 93,000 सैनिकों को घुटनों के बल भारत की सेना के सामने आत्मसमर्पण करवाने वाली देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अटलजी ने संसद में ‘दुर्गा’ की उपमा से सम्मानित किया था।

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1975 में इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाने का अटलजी ने खुलकर विरोध किया था। आपातकाल की वजह से इंदिरा गांधी को 1977 के लोकसभा चुनावों में करारी हार झेलनी पड़ी और देश में पहली बार गैरकांग्रेसी सरकार जनता पार्टी के नेतृत्व में बनी जिसके मुखिया मोरारजी देसाई थे। तब अटलजी को विदेश मंत्री जैसा महत्वपूर्ण विभाग दिया गया। अटलजी ने विदेश मंत्री रहते हुए पूरे विश्व में भारत की छवि बनाई और विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी में भाषण देने वाले वे देश के पहले वक्ता बने। अटलजी 1977 से 1979 तक देश के विदेश मंत्री रहे।अटलजी ने प्रधानमंत्री रहते हुए दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए पोखरण में 5 भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट कर संपूर्ण विश्व को भारत की शक्ति का एहसास कराया। अमेरिका और यूरोपीय संघ समेत कई देशों ने भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए लेकिन उसके बाद भी भारत, अटलजी के नेतृत्व में हर तरह की चुनौतियों से सफलतापूर्वक निबटने में सफल रहा।
पक्ष-विपक्ष से ऊपर उठकर राष्ट्र की राजनीति को सही मायने में अटल जी ने जिया, जो भारतीय राजनीति के लिए अनुकरणीय है। उनके बात कहने का जादुई अन्दाज और कटाक्ष करने की संजीदा अदा इतनी बेमिसाल थी कि उनके विरोधी भी उनकी इस अदा पर कायल हो जाते थे। राष्ट्र प्रेमी,कवि,कुशल राजनीतिज्ञ के रूप में उनका जीवन एक खुली किताब है।
राजनीति के लम्बे सफर में विवादों से ऊपर उठकर जो स्वीकार्यता उन्हें प्राप्त हुई,वह शायद  विरले लोगों को ही मिली है। राष्ट्र की सनातन संस्कृति के प्रति उनकी गहरी निष्ठा और समर्पण ने उनको विलक्षण कद प्रदान किया है । अटल जी जैसा दूसरा कोई व्यक्तित्व शायद ही देश और दुनिया में कोई हो।जिस हिम्मत के साथ अटल जी रक्षा के संबंध में  दुनिया के समक्ष चट्टानी दृढ़ता के साथ खड़े हो जाते थे,उसी हिम्मत के साथ वे लीक से हटकर फैसले  करने में भी माहिर थे। उनके अन्दर वह कला थी जो शायद ही किसी राजनेता के अन्दर मौजूद हो। पूरे देश के लिए अटल जी प्रेरणास्रोत हैं।
भारतीय राजनीति के युगपुरुष, श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ, कोमल हृदय संवेदनशील मनुष्य, वज्रबाहु राष्ट्रप्रहरी, भारतमाता के सच्चे सपूत, अजातशत्रु पूर्व  प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आज (25 दिसंबर 2017) को 93वां जन्मदिवस है। इस अवसर पर अंतरमन से ईश्वर से सिर्फ यही प्रार्थना है कि ईश्वर अटल बिहारी वाजपेयी को स्वास्थ्य लाभ एवं चिर-आयु के आशीर्वाद से सदैव परिपूर्ण रखें।