छत्तीस घाट :

यूं लग रहा है मानो विधानसभा चुनाव सर पर आ धमके हैं। प्रदेश की सत्ता पाने या खोने की छटपटाहट में सरकार और विपक्ष अपनी भूमिका और सफलताओं केे प्रवक्ता बन गए हैं। बेमिसाल चौदह साल के नारे के साथ सरकार अपना गुणगान कर रही है तो उधर विपक्ष अपनी भूमिका और सरकार की असफलताएं गिनाने से मानो पीछे नही रहना चाहता। जाहिर है मीडिया इनके लिए एक बड़ा प्लेटफॉर्म है। अखबारों में साक्षात्कार से लेकर न्यूज चैनलों के मीडिया कान्क्लेव या वेब पोर्टलों की ब्रेकिंग तक में छत्तीसगढ़ की आत्मा के न्यायवादी कृष्ण नजर आ रहे हैं।
इस मीडिया विमर्श में मुझे भी बुलाया गया था और मैं गया भी। न्यूज24 एक राष्ट्रीय स्तर का खबरिया चैनल है। अनुराधा प्रसाद और संदीप चौधरी जैसे विद्वान एंकर और सुकेश रंजन जैसे खोजी पत्रकार इसकी पहचान हैं। रमन सरकार के चौदह साल पूरे होने के मौके पर मीडिया हाउस ने राजधानी के पंचतारा होटल में मंथन नामक विमर्श आयोजित किया तो विपक्षी कांग्रेस और भाजपा सरकार से जुड़े कई नेता इसके साक्षी बने। अन्यथा एक महीने पहले ही जब एक क्षेत्रीय चैनल का मीडिया कांक्लेव हुआ था तो उसमें से विपक्ष नदारद था। नेता प्रतिपक्ष तक को नहीं बुलाया गया था। और तो और, आम जनता के मुंह पर भी तानाशाही की पट्टी बांध दी गई थी ताकि वह कोई सवाल ना पूछ सके।
सनद रहे कि सरकार से विज्ञापन लेकर उसका गुणगान करने की विवशता इतनी नही होनी चाहिए कि प्रश्र उठाने जैसे मीडिया के बुनियादी अधिकार या कर्तव्य को ही तिलांजलि दे दी जाए। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के बावजूद मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह ने सदाचार दिखाते हुए स्वीकारा कि नेता प्रतिपक्ष टी.एस. सिंहदेव के व्यवहार के वे कायल हैं। वही सिंहदेव ने भी ईमानदारी के साथ कहा कि रमन सरकार ने सडक़, बिजली और पीडीएस में सर्वश्रेष्ठ काम किया है। चैनल के निडर एंकरों ने जमीन घोटाला, भ्रष्टाचार, बढ़़ता नक्सलवाद और असफलताओं पर सरकार को चौतरफा घेरा, वहीं विपक्षी कांग्रेस वंशवाद, फेसलेस पार्टी, निष्क्रिय विपक्ष और गुटबाजी जैसे सवालों पर बगलें झांकते नजर आई।
सनद रहे कि कांग्रेस और भाजपा से जुड़े नेताओं के रिश्तेदार चैनल से जुड़े हैं लेकिन उन्होंने अपनी भूमिका को किसी विचारधारा या पार्टीगत हितों तक सिमटकर नही रहने दिया।  मंथन का पहला सत्र मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के नाम रहा। चूंकि वे अकेले ही थे इसलिए रोचक बहस की उम्मीद करना बेमानी था मगर जो उपलब्धियां मुख्यमंत्री ने गिनाईं, उससे यह साबित या अहसास हो गया कि विकास की कमान सही हाथों में है। दूसरे सत्र में टी.एस. सिंहदेव ने सधी हुई चुनौती दी कि भाजपा के पास मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह के चेहरे के अलावा है क्या? यही सवाल जब सरगुजा नरेश की तरफ उछला तो वे असहज हो गए। उनसे पूछा गया था कि कांग्रेस रमनसिंह का विकल्प चेहरे के रूप में क्यों नही दे सकी? इस सत्र में उच्च शिक्षा मंत्री प्रेम प्रकाश पाण्डेय बाबा के साथ थे। दोनों ने आक्रामक वार किए तो बेहतर बचाव भी। कई जगह दोनों फंसते-बचते नजर आए।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष धरम लाल कौशिक को मैंने पहली बार आमने-सामने पाया। नक्सलवाद के मुददे पर कांग्रेस जितनी आक्रामक दिखी, भाजपा उतनी ही बौनी नजर आई। अपराध, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक आतंकवाद पर कांग्रेस के तीखे सवालों ने जनता की खूब तालियां बटोरी। पर पार्टी अध्यक्ष भूपेश बघेल निजी जमीन अतिक्रमण, राजनीतिक हत्याएं, वंशवाद जैसे सवालों का कोई संतोषजनक सवाल नही दे सके। हां, उनकी इस ईमानदार स्वीकार्यता पर खूब ठहाके लगे कि बीस साल पहले शराब पीना छोड़ दिया है!
कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और राजधानी के स्मॉर्ट महापौर प्रमोद दुबे के बीच का तीसरा सत्र रोचक रहा। जनता की नुमाइंदगी करते हुए मेरे द्वारा यह सवाल उछाला गया कि टाटा स्टील यदि बस्तर से लौट जाता है तो क्या यह हमारे औद्योगिक विकास और रोजगार पाने की उम्मीदों पर पानी फेरने जैसा नही होगा, इस सवाल का दोनों ही नेता के पास कोई समाधानपरक उत्तर नही था। चाय की चुस्कियों के बीच जनता चुहलबाजी करने से नही चूकी कि दोनों के बीच सेटिंगबाजी का नायाब फार्मूला है।
चौथा सत्र यूथ आइकॉन पर केंद्रित रहा। भाजपा सांसद अभिषेक सिंह और कांग्रेस विधायक उमेश पटेल ने शालीनता और गंभीरता की चाशनी में लिपटे सवालों के साथ एक-दूसरे पर हमला बोला। जोगी कांग्रेस के नेता विधायक अमित जोगी आमंत्रित होने के बावजूद मंथन में नही पहुंचे अन्यथा टीआरपी के हिसाब से यह रोचक सत्र हो जाता। अभिषेक सिंह की दाद देनी होगी कि वे परफेक्ट आंकड़ों के साथ बात करना और समझाना सीख गए हैं ठीक अपने पिता की तरह। उधर उमेश भाई को खुद को मांजने-चमकाने की जरूरत है क्योंकि कई मुद्दों पर वे भटकते नजर आए।
मंथन का समापन कांग्रेस प्रभारी पूनिया साहब और भाजपा की धाकड़ प्रवक्ता सरोज पाण्डे के बीच हुई बिग-डिबेट से हुआ। सरोज जी ने बेबाकी के साथ सवालों के जवाब दिए मगर एक जगह आकर वे फंस गईं। कौन बनेगा मुख्यमंत्री, इस बात पर पुनिया साहब ने चुटकी लेते हुए सरोज जी पर कुछ कमेंट किए तो मैडम ने उन्हें सार्वजनिक चुनौती दे डाली। पूर्व नौकरशाह रहे कांग्रेस प्रभारी ने कोरबा में दिए बयान की याद करवाई जिसमें सरोज जी ने कहा था कि मुख्यमंत्री केंद्रीय आलाकमान से तय होगा। पूरी डिबेट में भारी लग रही सरोज जी पर पुनिया का यह सवाल भारी पड़ गया और वे जनता की तालियां बटोर ले गए। कुल मिलाकर सरकार, विपक्ष और जनता के इस आपसी मंथन से जो अमृत निकला, उससे छत्तीसगढ़ का लोकतंत्र अमरता की ओर बढ़ता रहेगा।
*अनिल द्विवेदी
(लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं)
ये लेखक के निजी विचार हैं