हमारे देश के खिलाडिय़ों की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्धि को लेकर जागरूक नागरिक, खेल विशेषज्ञ, खेल पत्रकार, खिलाड़ी, समाजसेवी, राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी सभी बहुत चिंतित रहे हैं। इस दिशा में कई सुझाव आये जिनमें से कुछ पर अमल हुआ कुछ पर नहीं। केन्द्र व राज्यों में विभिन्न राजनैतिक दलों की सरकारें आई और चली गई। विश्व स्तरीय खिलाड़ी तैयार करने की योजना बनाई गई परंतु परिणाम आशाजनक नहीं रहा। 20 वीं सदी की समाप्ति और 21 वीं सदी में अब तक कुछ खेलों में हमारे खिलाडिय़ों ने अच्छा परिणाम देना आरंभ किया है। भारत की करीब 130 करोड़ की आबादी को देखते हुए इस उपलब्धि को संतोषप्रद नहीं कहा कहा जा सकता है।

Advertisement

खेल के माध्यम से मनुष्य अनुशासन को सीखता है तथा शारीरिक रूप से स्वस्थ रहता है। 2014 में सत्ता में आते ही हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन्हीं बातों का ध्यान में रखते हुए देश के किशोरों, युवाओं यहां तक वरिष्ठजनों को खेल से जोड़े जाने पर जोर दिया। प्रधानमंत्री ने जीवन में खेल की महत्ता को देखते हुए खेलों इंडिया नामक न सिर्फ नये मिशन का आरंभ किया बल्कि केन्द्रीय खेल मंत्री के पद पर ऐसे राजनेता को बैठा दिया जो स्वयं 2004 के ओलंपिक खेलों में निशानेबाजी स्पर्धा के रजत पदक विजेता रहे हैं। केन्द्रीय खेल मंत्री राज्यवद्र्धन सिंह राठौर ने कुर्सी संभालते ही खेलों इंडिया मिशन को नई गति दी। वे इस तथ्य से पूरी तरह वाकिफ थे कि विश्व स्तरीय खिलाड़ी पैदा करने के लिए 10 से 17 वर्ष के किशोरों व युवाओं पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मंशा के अनुरूप राष्ट्रीय शालेय खेल में श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले खिलाडिय़ों के बीच नई दिल्ली में सर्व सुविधायुक्त खेल मंच पर फिर से प्रतियोगिता कराने का निश्चय किया। यही वजह है कि नई दिल्ली में 31 जनवरी से 8 फरवरी तक खेलो इंडिया मिशन के अंतर्गत पहले राष्ट्रीय शालेय खेलों का आयोजन हुआ और 16 ओलंपिक में खेलों यथा तीरंदाजी, एथलेटिक्स, बैडमिंटन, बॉस्केटबॉल, मुक्केबाजी, फुटबॉल, जिम्नास्टिक, हॉकी, जूडो, कबड्डी, खो-खो, निशानेबाजी, तैराकी, व्हॉलीबॉल, भारोत्तोलन, कुश्ती में मुकाबले हुए और अब हमारे पास भारत के युवा खेल प्रतिभाओं की फौज तैयार होना आरंभ हो गई है। अब उनके प्रशिक्षण, प्रशिक्षक, आधुनिक खेल सामग्री, खान-पान, पढ़ाई आदि की समस्या खत्म हो जायेगी। ऐसे सर्वश्रेष्ठ बालक-बालिकाओं को अपना ध्यान सिर्फ खेल के स्तर को सुधारने में लगाना होगा।
केन्द्र सरकार के इस निर्णय का सीधा लाभ ग्रामीण अंचल के खिलाडिय़ों को मिला है। स्कूल फेडरेशन ऑफ इंडिया की ओर से आयोजित राष्ट्रीय खेलों में ये प्रतिभागी स्वर्ण, रजत, कांस्य पदक जीत तो जाते थे । परंतु उसके बाद अधिकांश बालक-बालिका वास्तविक पूछ परख के अभाव में गुमनानी में खो जाते थे। कुछ खिलाड़ी जिला, राज्य खेल संघों के माध्यम से आगे बढ़ जाते थे लेकिन कुछ लोग भाई-भतीजावाद, पक्षपात का शिकार हो जाते थे। खेलों इंडिया  मिशन के माध्यम से आयोजित पहली राष्ट्रीय शालेय स्पर्धा ने पक्षपात, भाई-भतीजावाद, सूचना का अभाव, खिलाडिय़ों के झिझक आदि के बंधन को तोड़ दिया है। साथ ही भारतीय खेल इतिहास में पहली बार नन्हें-मुन्ने साथियों पर भविष्य के सितारा होने का भरोसा जताया है। पहले शालेय खेल के परिणाम पर नजर डालने से स्पष्ट हो जाता है कि हमारे देश के ग्रामीण अंचल के बच्चों ने शानदार परिणाम की बदौलत विश्व स्तरीय प्रदर्शन की आशा जगाई है। अब खेलों में शहरी व ग्रामीण, पिछड़े अंचल की प्रतिभाओं में भेदभाव नहीं किया जा सकेगा। राष्ट्रीय खेल स्पर्धा के नतीजें उन लोगों के लिए चेतावनी है जो खेल और खिलाडिय़ों को महज अपने हित के लिए इस्तेमाल करने के अभ्यस्त थे। केन्द्र सरकार के इस ऐतिहासिक कदम से आने वाले 5 से 8 वर्षों में भारतीय खिलाड़ी दुनियां में सितारों की तरह चमकेंगे।