हमारे देश में जब कभी भी चुनाव हो जाते हैं और स्कूल कालेज में जब कभी भी परीक्षाएं रख दी जाती हैं. देश की जनता चुनाव की गर्मी में झुलसती है तो स्कूल का विद्यार्थी परीक्षा के बुखार में तपता है. दोनों ही क्षेत्रों के प्रतिभागी अपनी अपनी किस्मत अजमा रहे होते हैं. इन चुनावों और परीक्षाओं में कई बाप और बेटों के प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है. नेता का भविष्य चुनाव परिणाम पर निर्भर तो विद्यार्थी का भविष्य परीक्षा के परिणाम पर टिका होता है.

हमारे स्कूल कालेज राजनीति की पहली पाठशाला बन गए हैं जहां के छात्र चुनाव इस कदर रंग लाने लगे हैं कि राजनीतिक चुनाव के बरोबर हो गए हैं – है कोई माई या आई का लाल जो इन छात्रों को इस्तेमाल किए बगैर नेता बना हो और है कोई ऐसा नेता जिसने अपने छात्र जीवन में चुनाव न लड़ा हो. कालेज का ‘मेरिटोरियस’ छात्र कलेक्टर बनता है तो ‘फेल्योर’ छात्र मिनिस्टर बनता है. ठीक वैसे ही जो चुनाव में जीत गया वो मुख्यमंत्री और जो हार गया तो ‘गव्हर्नर’. शायद इसीलिए हमारे पाठ्यक्रम में भी ‘ग’ से गणेश की जगह में ‘ग’ से गदहा पढाया जाता है, गदहा ज्यादा सार्वभौमिक भी है. हमारे धर्म-निरपेक्ष देश में गणेश सभी मज़हब में नहीं पाया जाता लेकिन गदहा…?

चुनाव और परीक्षा कभी एक दूसरे के पर्याय हो जाते हैं. जो चुनाव में खड़े होते हैं उनके लिय यह परीक्षा की घड़ी होती है .. तन-मन-धन और यश अपयश सब कुछ दांव पर लगा होता है. चुनाव की अग्नि परीक्षा में फेल हो जाने के बाद कुछ लोगों को रोटी के लाले पड़ जाते हैं तो कुछ महानुभावों की रोजी-रोटी ही चुनाव जीत जाने के बाद शुरू होती है. ऐसे कर्णधारों के लिए राजनीति जनसेवा नहीं व्यवसाय होती है.  फिर वे जोर शोर से धंधे में लग जाते हैं. कुछ लोगों का यह धंधा इतना फला-फूला कि वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता चला गया. आजादी के बाद नेतागिरी को पुश्तैनी धंधा मानकर चलने वालों की संख्या खूब बढ़ी है.

जिस तरह चुनाव नेताओं के भविष्य का वारा-न्यारा करते हैं उसी तरह परीक्षाएं विद्यार्थियों का भविष्य निर्धारित करती हैं. परीक्षाएं या तो अपने उम्मीदवारों को सफल कर उन्हें नौकरी के योग्य बना दे या फिर बेरोजगार बनाकर उन्हें नेतागिरी के लिए छोड़ दे. हमारी चरमराती व्यवस्था में एक बात अब स्पष्ट हो गई है कि जो नौकरी के लिए अयोग्य घोषित हो गया वह राजनीति में फिट हो गया. वह झक्ख मारकर राजनीति में जाता है अगर किस्मत ने पलटी खाई तो राजनीति ही उसके लिए रोजगार धंधा बन जाती है.

चुनाव और परीक्षा दोनों के आने के पूर्व दोनों के उम्मीदवारों की हालत चिन्ताजनक हो जाती है, उनके ‘रूटीन’ में अचानक और भयानक परिवर्तन हो जाता है – वे अर्द्धनिद्रा की हालत में आधी रात को ही उठ जाते हैं और अपनी दिनचर्या को रूप देने में तत्पर हो जाते हैं. चुनाव का प्रत्याशी अपने जनसंपर्क की योजना बनता है. वह स्थानीय नेताओं, प्रचारकों और कार्यकर्ताओं से मिलता है. मतदाताओं को आश्वासन देता है. झोपड़पट्टियों में पैसे बांटता है. चुनाव के दिन उसके कार्यकर्ता मतदाताओं को ढोकर मतदान केन्द्र तक ले जाते हैं. कुछ जाली मतदान करवाने के प्रयास के बाद ‘काउंटिंग’ के दिन हेराफेरी के लिए भरपूर मौका प्राप्त करता हुआ वह ‘येन-केन-प्रकारेण’ चुनाव जीत जाने का प्रयास करता है.

परीक्षा का उम्मीदवार परीक्षा पास आने पर रोज सुबह कालेज और लेबोरेटरी की ओर चला जाता है. वह संभावित एक्सटरनल और इंटरनल्स से मिलता है. वह थ्योरी से पहले प्रेक्टिकल मार्क्स की जुगाड़ कर लेता है. प्रश्नपत्र होने वाले दिनों के लिए वह इंटरनल्स, पानी पिलाने वाले चपरासी तथा अपने जूनियर व सीनियर मित्रों की एक टीम बनाता है. इसके बाद प्रश्नपत्रों के आउट होने, उसके उत्तर की नक़ल तैयार करने, उसे परीक्षा भवन में मित्रों द्वारा चपरासी के हाथ पहुंचवाने आदि का पूर्वाभ्यास करता है. थ्योरी के निपट जाने के दुष्कर दायित्व को निर्विघ्न सम्पादित करा लेने के बाद वह पेपर कहाँ जाएगा और कौन जांचेगा आदि के शोध कार्यों में भिड़कर – येन-केन-प्रकारेण परीक्षा पास कर लेता है.

इस तरह चुनाव और परीक्षा दोनों अनेक समीकरणों को हल करने और जालसाजी के कई तरंगों को पार कर लेने के जोखिम भरे खेल से भरे होते हैं. हर साल की परीक्षा के परिणाम आने वाले चुनाव के कई प्रत्याशी भी निर्धारित कर देते हैं.