धराशायी होने का सिलसिला

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सुनने से लगता है कि यह कांग्रेस और कांग्रेसियों पर है जिनके नेता आजकल कहीं भी धराशायी हो रहे हैं. पहले देश में कांग्रेस का एकछत्र राज्य था. उनके विरूद्ध कोई खड़ा होता था तो उसके धराशायी होने की गारंटी थी. उसकी कोई मियाद भी नहीं थी कि वह धराशायी हुआ प्रत्याशी कब खड़ा होगा. कांग्रेस उन्हें धराशायी करने की गारंटी लेता था उन्हें खड़ा करने की नहीं. इस काम में कांग्रेस को महारत हासिल हो गई थी और हारे हुए नेता और देश की बिगड़ी हुई दशा को ठीक करने की गारण्टी उसने नहीं ली. कांग्रेस का यह पासा परवान चढ़ रहा है भले ही उसके लिए उल्टा पड़ रहा है लेकिन इसे दूसरे वैकल्पिक दल भी आजमाते जा रहे हैं. इस काग्रेसी कल्चर का वाइरस इस कदर फ़ैल गया था कि उसके पीछे आने वाली सभी पार्टियों में इस वाइरस के मिलने की गारण्टी है. यह कीटाणु सबसे ज्यादा भाजपा में आ गया है.. और उसका भी एच.आई.वी. एकदम पाजीटिव दिख रहा है.

देशहित और जनकल्याण को लेकर जैसी नकारात्मकता कांग्रेस में थी वैसी ही भाजपा में भी देखने को मिलती है बल्कि यहां तो करेला वो भी नीम चढ़ा वाली हालत है. कांग्रेस ने सत्ता भोगने के रामबाण नुस्खे कुछ इस तरह से तैयार किए कि गद्दी पाने के बाद हर कोई कांग्रेसी साबित हो जाता है. कह सकते हैं कि पहले देश एक कांग्रेस को झेल रहा था अब कहिए कि दो कांग्रेस पार्टी उसके गले में फांस की तरह झूल रही है. एक कांग्रेस की और दूसरे उसके प्रतिनायक की. कहने को नाम अलग हैं पर चेहरे एक हैं. विपक्ष में कांग्रेस तो है ही पर सत्ता में जो है वह भी उसका भाई है. ऐसा भाई जिसके बारे में कहावत है कि ‘जितने भाई उतने दुश्मन.’ आधे से अधिक भाजपाई नेता तो सब पुराने कांग्रेसी हैं. जैसे पुराने हिंदू मुसलमान हो गए हैं वैसे ही पुराने कांग्रेसी अब भाजपाई हो गए हैं. असली धर्म परिवर्तन तो राजनेताओं में चल रहा है. नैतिकता का इतना तकाजा है कि कभी भी अपनी पार्टी छोड़ दी और दूसरी में घुस गए. देशहित में जारी इस धर्म परिवर्तन के बाद भी यह स्पष्ट दिख रहा है कि राजनेताओं का कोई धर्म नहीं होता. राजनीतिक धर्म का रंग अगर भगवा हो भी जाए तो भी झंडा छोड़कर चाल, चेहरा और चरित्र काला ही होता है.  इस तरह भी धर्म निरपेक्षता आएगी किसी ने सोचा भी नहीं था.

एक तरफ गारंटी है तो दूसरी ओर वारंटी है. कांग्रेस ने देश को खुशहाल रखने की गारंटी दी थी तो भाजपा ने रामराज लाने की वारंटी दी थी. गारंटी में माल खराब होने पर ग्राहक को दूसरा माल दे दिया जाता है. वारंटी में माल खराब निकलने पर उसे सुधारा जाता है. कांग्रेस बिगड़ी हुई दशा के बदले में दूसरी अच्छी व्यवस्था देने की गारण्टी से अक्सर मुकरती रही है और भाजपा अपने वारंटी पीरियड में काम करने से हमेशा चूकती रही है. कांग्रेस के खराब माल को समय पर सुधारने की वारंटी भाजपा ने दी थी पर न कांग्रेस अपना गारंटी पूरा कर पाई और न भाजपा अपना वारंटी. उसका राममन्दिर बनाने व रामराज लाने का छलावा पच्चीस बरस पुराना हो गया – अब होइहैं वही जो राम रचि राखा. राम जी की कृपा से कर्नाटक में कांग्रेस के नेता धराशायी हो रहे थे तब बनारस में भाजपा का पूल धराशायी हो रहा था. सबसे ज्यादा तीरथ बरथ करवाने, सबसे बड़ा कुंभ भरवाने, गंगा जमुना में रोज रोज डुबकी लगाने और तिस पर महंत योगी को मुख्यमंत्री बना देने के बाद भी आंधी-तूफान व सबसे ज्यादा आपद को उत्तरप्रदेश भोग रहा है और उसके महंत योगी इस आपद में निरापद भाव से सरकार में बैठे हुए हैं.

मोदी जी कहकर आए थे कि ‘मुझे केवल दस बरस चाहिए.’ इनमें पांच तो निकलने जा रहे हैं. बचे पांच और निकल जाएंगे. समय आदमी की मुट्ठी में रेत की तरह है. बंधी मुट्ठी में से रेत कब खिसक जाती है मुट्ठी बांधे आदमी को पता नहीं चलता. आदमी की भी क्या गारंटी कि वह कब खिसक जाए.. और हमारे देश में नेता की कोई गारंटी वारंटी तो होती नहीं. यह तो इस देश का एक आम आदमी लिखकर देने का दावा भी कर देता है इस जोश के साथ कि ‘मेरी बात को वकील भी नहीं काट सकता.’

कांग्रेस को हराकर भाजपा खुश हो जाती है. भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने से कांग्रेस खुश हो जाती है. मतगणना का न जाने कैसा गणित है कि जनता वोट कांग्रेस को ज्यादा देती है पर सीटें ज्यादा भाजपा को मिल जाती हैं. एक दल ज्यादा वोट पाने तो दूसरा दल ज्यादा सीट पाने का श्रेय लेते हुए एक दूसरे को धराशायी कर दिया ये मानकर चलते हैं. कर्नाटक के राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को बहुमत साबित करने के लिए दो दिन के बदले पन्द्रह दिन की मोहलत देकर विपक्षी दलों को धराशायी कर दिया था. तब कोर्ट ने इस नीतिगत मामले में निर्णय को गलत बताकर फिर से दो दिनों की मोहलत पर लौटा दिया. पहले न्यायालय प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री को ही पटखनी देते थे पर अब राज्यपालों की भी शामत आई हुई है. अब राष्ट्रपति भर बचे हैं. एकाध दिन आँखों में कालीपट्टी बांधी देवी का तराजू उनको भी तौलता ही है.

कांग्रेस के बयान को मोदी धराशायी कर देते हैं और मोदी की बात को मीडिया उठा देता है तब इस मोदी मीडिया को भारतीय प्रबुद्धजन गोदी मीडिया कहे देता है. पहले मीडिया को कांग्रेसी गाली देते थे आजकल भाजपा सहित सभी राजनीतिक दल उन्हें गाली दे रहे हैं. समझ में नहीं आ रहा है कि मीडिया अभी है किस तरफ? इस नासमझी में मीडिया भी अपने मोर्चे पर धराशायी दिखाई देता है. उसके साथ विश्वसनीयता का संकट आ गया है. उसे पहली बार इतना विश्वासघाती माना जा रहा है कि उसका समाचार महाभारत के ‘अश्वस्थामा हतोहतः’ की तरह फ़ाल्स और फेक न्यूज़ होता जा रहा है.

संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की करनी और भाषा दिनोंदिन असंवैधानिक होती जा रही है. लोकतंत्र, संसद, संविधान, न्यायालय और चुनाव आयोग किसी पर भी इनकी आस्था नहीं दिखती. सार्वजनिक मंचों से अब अभद्र भाषाएँ बड़े बड़े हुक्मरान बोलने लग गए हैं. यह भी पहली बार देखने में आ रहा है कि सार्वजनिक मंचों से एक प्रधानमंत्री शेष प्रधानमंत्रियों की निंदा कर रहे हैं उनका उपहास उड़ा रहे हैं. अपनी बात रखने के लिए अब तर्कों का सहारा कम और गालियों का सहारा अधिक लिया जा रहा है. वे समझते हैं कि उनकी धारणा को बल मिल रहा है जबकि उन्हें अपनी ही धारणा को धराशायी करते हुए यह देश रोज रोज देख रहा है.

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हिंदी व्यंग्य के सुस्थापित लेखक विनोद साव ने अनेक उपन्यास, कहानियाँ, संस्मरण और यात्रावृत्तांत लिखे हैं. उनकी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं. उनकी रचनाएँ हंस, पहल, वसुधा, अक्षरपर्व, ज्ञानोदय, वागर्थ और समकालीन भारतीय साहित्य में छपी हैं. उन्हें वागीश्वरी और अट्टहास सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं. वे उपन्यास के लिए ड़ा.नामवर सिंह और व्यंग्य के लिए श्रीलाल शुक्ल से भी सम्मानित हुए हैं. उनके नियमित स्तंभ का नाम रहेगा 'मैदान-ए-व्यंग्य'. लीजिए प्रस्तुत है उनकी पहली रचना 'बारिश और दंगा.'

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