आखिरकार ढेर सारे विवाद और टकराव के बावजूद फिल्म ‘पद्मावत’ को पूरे देश में दिखाए जाने का रास्ता साफ हो गया। फिल्म निर्माता की याचिका पर गुरुवार को फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने चार राज्यों द्वारा फिल्म पर लगाई गई पाबंदी हटाने का आदेश दिया और उनकी संबंधित अधिसूचनाओं पर रोक लगा दी Iपद्मावत फिल्म के बारे में पहले सेंसर बोर्ड और फिर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आ जाने के बाद सारा विवाद समाप्त हो जाना चाहिए था लेकिन फिर भी मैं यह मानता हूं कि यदि कोई उसका विरोध करना चाहे तो जरुर करे। यह भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दूसरा पहलू है।
आखिर फिल्म सेंसर बोर्ड में पेश किए जाने से पहले ही उस पर एक के बाद एक कई राज्यों में प्रतिबंध के आदेश जारी होने का क्या मतलब था? और भी दुखद यह है कि फिल्म को सेंसर बोर्ड की हरी झंडी मिल जाने के बाद भी चार राज्यों की सरकारों ने प्रतिबंधात्मक आदेश जारी कर दिए। ऐसे में हमारे लोकतंत्र का क्या होगा? लोकतंत्र संवैधानिक और स्वायत्त संस्थाओं के संवैधानिक अधिकारों और स्वायत्तता का सम्मान करके ही चल सकता है। कुछ राज्य सरकारों ने सेंसर बोर्ड के फैसले की जैसी अवहेलना की वह बहुत ही दुखद है। बेशक लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध की जगह है। जो संगठन इस फिल्म के विरोध में हैं वे लोगों से फिल्म न देखने की अपील कर सकते हैं। लेकिन सेंसर बोर्ड और अब सर्वोच्च न्यायालय के भी फैसले को लागू न होने देने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है। सर्वोच्च अदालत ने इस संदर्भ में भी राज्य सरकारों को उनके कर्तव्य की याद दिलाई है।
क्षत्राणियो ने फ़िल्म पद्मावत का पोस्टर फाड़कर छत्तीसगढ़ में रिलीज बैन करने कि मांग कि
विवादास्पद फिल्म पद्मावती को पद्मावत बनाकर की जा रही रिलीज को छत्तीसगढ़ में बैन करने की मांग को लेकर राजपूत क्षत्रिय समाज ने गृहमंत्री रामसेवक पैकरा को ज्ञापन सौंपा एवं पद्मावत के पोस्टर को फाड़ कर विरोध जताया। इस दौरान संजय लीला भंसाली के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई इस दौरान राजपूत क्षत्रिय महासभा के प्रदेश अध्यक्ष होरी सिंह डोड़ ने कहां की फिल्म पद्मावती के निर्माण के समय से ही राजपूत समाज के द्वारा इस फिल्म के निर्माण पर ही बैन लगाने की मांग की जा रही थी। अब राजपूत समाज के आपत्ति पर मुहर लग गया जब इस फिल्म का नाम बदलकर एवं फ़िल्म के कुछ अंशों को काटकर सेंसर बोर्ड ने फिल्म के प्रदर्शन की अनुमति दिया है। इसे स्पष्ट हो जाता है कि फिल्म के जरिए राजपूत क्षत्रिय समाज के मान सम्मान को चोट पहुंचाने का काम किया जा रहा था इसके पहले भी राजपूतों के शहादत बलिदान जनसेवा त्याग-तपस्या को भुलाकर मात्र धन कमाने की लालसा में कपोल कल्पित कहानी गढ़ कर राजपूतों के इतिहास के साथ छेड़छाड़ कर फ़िल्म निर्माताओ के द्वारा फ़िल्म का निर्माण किया जा चुका है और ऐसे पिक्चर के माध्यम से जनमानस में राजपूतों के प्रति घृणा उत्पन्न हुआ है। उन्होंने फिल्म पद्मावती के नाम बदलकर पद्मावत कर की जा रह रिलीज को रोक लगाने की मांग करते हुए कहा कि देश के अन्य राज्यों ने अपने अधिकार का उपयोग कर समाज की भावनाओं को समझते हुए इस फिल्म के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया है अब छत्तीसगढ़ सरकार भी छत्तीसगढ़ में रहने वाले राजपूतों के भावनाओं को समझें और छत्तीसगढ़ में इसके प्रदर्शन पर रोक लगाये।
सारी दुनिया ईश्वर के अस्तित्व को मानती है लेकिन यदि कुछ नास्तिक लोग उसे नहीं मानते हैं तो न मानें। उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता है। लेकिन किसी भी बात को न मानने वाले के पास कुछ तर्क तो होने चाहिए। करणी सेना पद्मावत का विरोध कर रही है लेकिन क्यों कर रही है, यह उसे पता ही नहीं है। करणी सेना के किसी भी जिम्मेदार नेता ने उस फिल्म को देखा क्या ?
फिल्म को देखे बिना ही कहना कि फिल्म दिखाई गई तो सैकड़ों राजपूत महिलाएं जौहर कर लेंगी। राम, राम! ऐसी बात सुनना ही मुझे मृत्युदंड की तरह लगता है। ऐसा सोचना भी अपनी बहनों के साथ बड़ा अन्याय करना है।  जहां तक सिनेमा घरों को आग लगाने की बात है, सर्वोच्च न्याायलय ने राज्य सरकारों को जो आदेश दिया है, उसका पालन उन्हें करना ही है। राज्य सरकारों ने फिल्म पर प्रतिबंध लगाने का जो निर्णय किया था, वह जनभावना का सम्मान करने की दृष्टि से किया था लेकिन उसका अर्थ यह भी निकला था कि ये सरकारें अपने सेंसर बोर्ड पर ही भरोसा नहीं करतीं।
कुछ फिल्मी लोगों ने इसे सरकारों का कायराना रवैया भी कहा था लेकिन इन चारों प्रांतीय सरकारों से मैं अनुरोध करुंगा कि प्रदर्शनकारियों के साथ उनका बर्ताव बहुत ही शालीनतापूर्ण होना चाहिए और प्रदर्शनकारियों से मैं निवेदन करुंगा कि वे विरोध करना चाहें तो जरुर करें लेकिन वह पूर्णतः अहिंसक और अनुशासित होना चाहिए। राजपूत परिवारों में जैसी मर्यादा और गरिमा हम हमेशा देखते आए हैं, उसकी रक्षा अवश्य होनी चाहिए।