फिल्म ‘न्यूटन” में बस्तर के अबूझमाड़ क्षेत्र के एक ऐसे दुर्गम  पोलिंग बूथ की कहानी दिखाई गई है जहाँ पहुँचना काफी मुश्किल है। यहाँ सिर्फ 76 मतदाता हैं और शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न कराने के लिए की गई कवायदें दिखाई गई हैं। इस कहानी की पृष्ठभूमि पूरी तरह सच्ची है, सिर्फ किरदार काल्पनिक हैं।
कहानी में न्यूटन नाम के किरदार ने एक ऐसे सरकारी नौकर का चेहरा दिखाया है जो नक्सलवाद जैसी बड़ी समस्या का एकमात्र समाधान लोकतंत्र के पर्व यानी चुनाव और सुशासन को मानता है। भले ही देश 70 साल पहले आजाद हुआ हो  लेकिन बस्तर आज भी उस आजादी के लिए  संघर्ष कर कर रहा है I भले ही चुनाव को लोकतंत्र का महापर्व  कहते है लेकिन बस्तर में चुनाव के नाम पर खानापूर्ति और मजाक ही होता आया है I  राजनीति करते करते छत्तीसगढ़ सरकार नक्सलवाद के खात्मे के लिए नीति और रणनीति बनाना भूल गयी है, न्यूटन में बस्तर की स्थिति का महज ट्रेलर दिखाया गया है, असली बस्तर आज भी मुलभुत सुविधाओं के लिए लड़ रहा है, यह इलाक़ा माओवादियों के स्वघोषित दंडकारण्य क्षेत्र का हिस्सा है और नक्सली  संगठन का दावा है कि इन इलाक़ों में उनकी समानांतर सत्ता चलती है। आये दिन दीवारों और बाजार में धमकी भरे पोस्टर लगा दिए जाते हैं, कभी चुनाव बहिष्कार करने के लिए तो कभी गांव वालों के बच्चो को स्कूल से नाम कटवाने हेतु I  लोग कहते हैं कि अधिकारी इन पोस्टरों को हटाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं हालांकि पुलिस और प्रशासन इस बात से इनकार करते हैं मगर इन इलाक़ों में घूमने के बाद यह तो समझ में आता है कि सरकारी तंत्र की पकड़ सिर्फ़ क़स्बाई इलाक़ों तक ही सीमित है। कहीं-कहीं पर तो क़स्बों पर से भी प्रशासन की पकड़ ढीली पड़ चुकी है। गीदम से चित्रकूट तक माओवादियों द्वारा डंके की चोट पर चुनाव बहिष्कार के पर्चे चिपका दिए जाते है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह पोस्टर कई हफ्तों से इसी तरह टंगे हुए हैं मगर प्रशासनिक अधिकारियों में इन्हें हटाने की हिम्मत नहीं होती है।
बुनियादी सुविधाओं की बाट जोहते इन इलाकों में हर साल औसतन 500 लोगों की मौत हैजा, मलेरिया या अन्य संक्रमण से इलाज के अभाव में होती रही है। इस वर्ष भी स्थिति  वैसी ही है, छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में अब तक आजादी के बाद भी विकास नाम की चिड़िया तो कभी पहुँची ही नहीं, इतना ही नहीं यहां सरकार एवं प्रशासन भी महज प्रतीकों के रूप में जिंदा रहे है। ऐसे महौल में नक्सली कुछ ही सालों में दादा बन बैठे तो इसमें आश्चर्य कैसा, दूर राजधानी में बैठ कर बस्तर के मुतालिक फैसले तब भी होते थे और अब भी हो रहे है। माओवादियों के चुनाव बहिष्कार के नारे के बाद ग्रामीण इलाकों में चुनाव की कोई सुगबुगाहट नहीं है जबकि शहरी इलाक़े राजनीतिक दलों के पोस्टरों से पटे पड़े हैं। इन इलाकों में न तो प्रचारक जा रहे हैं और न ही कार्यकर्ता।
2008 चुनाव में चुनाव अधिकारियों के मुताबिक नक्सल प्रभावित बस्तर ज़िले में महज 17 प्रतिशत ही वोट डाले गए हैं और दंतेवाड़ा में 40 प्रतिशत मतदान हुआ है, सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बीजापुर में 21 प्रतिशत ही मतदान हुआ है जबकि पिछली विधानसभा में इस विधानसभा क्षेत्र में 37 प्रतिशत मतदान हुआ था। इससे पहले मतदान के दौरान सवेरे नक्सली विद्रोहियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच दस से अधिक हिंसक मुठभेड़ें हुई। मतदान के दौरान वोटिंग मशीनें लूटे जाने की ख़बरें भी मिली थी। जगदलपुर से मतदान करवाकर लौट रहे चुनाव अधिकारियों के हेलीकॉप्टर पर नक्सलियों ने फ़ायरिंग की। इससे पहले पुलिस के अनुसार कई जगह नक्सलियों ने मतदान अधिकारियों के दल पर फ़ायरिंग की थी और उन्हें वापस भगा दिया, कई जगहों पर वोटिंग मशीन छीनने की कोशिश हुई।
शायद इसीलिए इसे माओवादियों के प्रभाव का इलाक़ा कहा जाता है। अधिकारी मानते हैं कि नक्सलवाद की समस्या का समाधान सिर्फ़ पुलिस के बल पर नहीं किया जा सकता। ज़ाहिर है कि इसके लिए ज़रूरी है कि इन सुदूर और दुर्गम इलाकों में भी विकास की किरणें पहुँचें जिसकी पहल करने का दावा सरकार कर रही है।
कुछ इलाक़ों में बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) सड़कें भी बना रही है हालांकि कई स्थानों पर माओवादी इसका विरोध कर रहे हैं।
बस्तर आखरी साँसे ले रहा  है, बस्तर में चलने वाले नक्सल राज की खूनी कहानी हर गांव में आपको सुनने को मिलेगी। बंदूक और हिंसा की राजनीति का नतीजा यह हुआ है कि शांतिपूर्ण जीवन के आदी आदिवासियों का जीवन बिखर चुका है। सरकारी आंकडों के मुताबिक 2015 में नक्सली हिंसा में मरने वाले सीआरपीएफ, माओवादियों और ग्रामीणों की संख्या लगभग बराबर थी. सीआरपीएफ के 47 जवान, 46 माओवादी और 47 ग्रामीण मारे गए थे I
नक्सलवाद ख़त्म हो सकता है बशर्ते सबसे पहले वनवासी क्षेत्रों के लिए विकास के अलग मॉडल को विकसित करना होगा, जिसमें उनकी जंगल और जमीन सुरक्षित रहे। विकास की मौजूदा सोच की दिक्कत यह है कि इसकी शुरुआत ही वनवासियों के घर, जंगल, पड़ोस और परिवेश की बलि से होती है, इस कीमत पर कोई भी वनवासी किसी विकास का स्वागत नहीं कर सकता। अन्यथा यह खुनी लड़ाई चलती रहेगी और इसी प्रकार कोई और “न्यूटन” बस्तर के दर्द को बयां करेगा।

*ये लेख़क के निजी विचार हैं