अब तो बारिश और दंगों का कोई भरोसा ही नहीं रहा. जब कभी भी बारिश हो जाती है और जहां कहीं भी दंगा. कामकाजी लोगों को हरदम ये खौफ रहने लगा कि न जाने कब बारिश हो जाए और न जाने कब दंगा. बच्चे तो हर साल बारिश में बहाने बनाकर स्कूल कालेज जाने से कन्नी काट लिया करते हैं लेकिन अब उन्हें बहाने बनाने के लिए दंगे भी खूब नसीब होते हैं. बस थोड़ी से कहीं कुछ अफवाह उड़ी नहीं कि स्कूल कालेज बंद. सरकार समझती है कि छुट्टियां कर देने से दंगों पर नियंत्रण होगा जबकि हमारे उत्साही नौजवान छुट्टियाँ मिल जाने से और भी जोर शोर से दंगो में शामिल हो जाते हैं.

बारिश और दंगे दोनों एक साथ नहीं होते. या बारिश होती है या दंगा. हमारे यहां बहुत से दंगे इसलिए सफल हो पाते हैं क्योंकि ऐनमौके पर बारिश नहीं होती. कभी किसी शहर में दंगे की खूब तैयारी होती है. इनमें ज्यादातर त्रिपुंडधारी और दाढ़ीधारी होते हैं – लाठियों को तेल से चुपड़ा और चाकुओं को चकमक किया. आँखों में सुरमा डालकर वे सूरमा बनकर निकलते हैं.. लेकिन सब किए-कराए पर पानी फिर जाता है जब जमकर बारिश हो जाती है. सब कुछ तितर-बितर हो जाता है और दंगा नहीं हो पाता. ऐसी ही बारिश अगर मौके पर नसीब होती रहे तो दंगे का कोई नामलेवा न रहे.

पहले दंगा और बारिश दोनों ही अचानक और भयानक हुआ करते थे लेकिन आज आदमी ने इतनी बढ़ोत्तरी कर ली है कि जब मन चाहा बारिश करा ली और जब जी चाहा दंगा. ऐसा करने-कराने वाले बड़े बड़े एक्सपर्ट होते हैं लेकिन अभी हमारे देश इस किसम के विशेषज्ञ केवल दंगों के हुए हैं, बारिश के नहीं. यदि हमारे यहां भी कुछ बारिश एक्सपर्ट हो जाएं तो हर संभावित दंगों के ऊपर हम बारिश करा लें. पर अफ़सोस, हमारे यहां बारिश ऊपर वाले की मरजी और दंगा नीचे वाले की.

दंगा और बारिश दोनों का बैक-ग्राउंड एकइच होता है. बारिश होने से पहले धधकती धूप होती है, तेज गर्मी पड़ती है, फिर उमस बढती है, बदली छाती है, काले-सफ़ेद मेघों का गुबार छाने लगता है, फिर बरसीले-कपसीले बादल आपस में टकराते हैं, तब बिजलियाँ चमकती हैं, बादल गरजते हैं और बारिश शुरू हो जाती है.  दंगों के पीछे भी यइच होता है. दंगे के पहले दंगाइयों के दिल में शोले धधकते हैं. वे गरम हो उठते हैं, उनके दिलों दिमाग पर काले कारनामों का गुबार छाने लगता है, आँखों में खून उतरता है, फिर काले सफ़ेद दंगाई आपस में टकराते हैं, उनके दांत किटकिटाते हैं, बिजलियों की तरह उनकी तलवारें चमकती हैं, लाठियां कडकती हैं, फिर पुलिस बलों के अश्रुगैस के गोले धमकते हैं, उनकी बन्दूक से ताबड़तोड़ गोलियाँ निकलती हैं और गोलियाँ खाने वालों के लहू बरसते हैं.

जिस तरह हमें एक मौसम विभाग मयस्सर होता है वैसे ही एक दंगा विभाग भी खोला जाना चाहिए ताकि वे बारिश की तरह अनुमान लगाकर हमें संभावित दंगों की खबर भी कर दें. लेकिन भाई साब.. सोचने वाली बात तो यह है कि मौसम विभाग के बारिश का अनुमान ही कितना सही होता है.