सिफारिश नहीं उपलब्धि हो अवार्ड का आधार

खेलकूद में विशिष्ट उपलब्धि के लिए केन्द्र सरकार ने खिलाडिय़ों को राष्ट्रीय स्तर पर अर्जुन पुरस्कार देने की परम्परा 1961 से आरंभ की। ध्यानचंद पुरस्कार ऐसे खिलाड़ी को दिया जाता है जिसने अपना जीवन खेल को समर्पित किया हो। इसकी शुरुवात 2002 से हुई। द्रोणाचार्य पुरस्कारों में विख्यात प्रशिक्षकों को सम्मानित किया जाता है, इसका आरंभ 1985 से हुआ। वर्ष भर अपने खेल में शानदार उपलब्धि हासिल करने वाले खिलाड़ी को खेल रत्न दिया जाता है। 1991-92 से यह पुरस्कार दिया जा रहा है।
राजीव गांधी खेल रत्न अब तक 34 खिलाडिय़ों को दिया जा चुका है। 1961 से लेकर 2017 तक कुल 700 खिलाडिय़ों को अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। ध्यानचंद अवार्ड जो कि खिलाड़ी के सेवानिवृत्ति के बाद भी खेल से जुड़े रहने पर मिलता है अब तक 51 खिलाडिय़ों को दिया जा चुका है। द्रोणाचार्य पुरस्कार की शुरुवात 1985 को हुई और अब तक 104 प्रसिद्ध प्रशिक्षकों को दिया जा चुका है।

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इन सभी सम्मानों के लिए ओलम्पिक एसोसिएशन की सिफारिश जरूरी होता है। वस्तुत: आज जबकि समय बदला है। हार-जीत के मायने बदल गये हैं। अब पुरस्कार समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करने का प्रतीक माना जाता है। कई खेल संगठन या खिलाड़ी इस तरह के सम्मान प्राप्त करने के लिए जरूरत से ज्यादा सक्रिय होते हैं। जिसके उचित खिलाड़ी नया प्रशिक्षक का नाम आगे नहीं बढ़ पाता है। कई बार खेल संगठन से किसी खिलाड़ी/प्रशिक्षक की आपसी खीचातान बाधा बन जाती है। वास्तव में इस तरह के सिफारिश की परम्परा को बदलने के लिए पुनर्विचार करना चाहिए। खिलाड़ी या प्रशिक्षक द्वारा एक साल में या उसके खेल कैरियर के दौरान की उपलब्धि उनके द्वारा प्राप्त पुरस्कार में शामिल होता है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जीते गये पदक के आधार पर अवार्ड के हकदार वास्तविक खिलाड़ी/प्रशिक्षक को अंक दिये जाने से स्थिति साफ हो जायेगी। इसमें मल्टी स्पोर्ट स्पर्धा में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एकल या टीम की उपलब्धि के आधार पर अंक दिये जाने की पद्धति आरंभ की जानी चाहिए। ओलंपिक में स्वर्ण-रजत-कांस्य पदक प्राप्त करने वालों को ज्यादा अंक, एशियार्ड खेलों के विजेताओं को उससे कम, राष्ट्रमंडल खेलों के पदकवीरों को उससे भी कम अंक, पृथक-पृथक विश्व व एशिया स्तरीय खेलों के लिए अलग अंक प्रणाली बनाई जाना चाहिए। राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्धि के लिए स्वर्ण-रजत-कांस्य पदक हासिल करने वालों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए। इन दिनों में मीडिया के माध्यम से पता चल रहा है कि 2018 के खेल पुरस्कार/सम्मान के लिए खेल संघों द्वारा खिलाडिय़ों/प्रशिक्षकों के नामों की सिफारिश की जा रही है। अब इसमें बदलाव की आवश्यकता है। ऐसे खेल संघ जो कि भारतीय ओलंपिक संघ से राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हैं उनकी भूमिका इससे कम नहीं होगी। वस्तुत: खिलाडिय़ों/प्रशिक्षकों के बारे में साल भर की जानकारी प्राप्त रहेगी। उन्हें इन आंकड़ों को संभालकर रखना होगा और खेल अवार्ड के समय खेल संघों को उन आंकड़ों को खेल एवं युवा कल्याण विभाग भारत सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना होगा। इसके बाद अंकों के आधार पर आसानी से अवार्डी का चयन हो सकेगा। इस तरह की प्रक्रिया से कोई खिलाड़ी/प्रशिक्षक असंतुष्ट नहीं हो सकेगा।

अवार्ड के लिए खिलाडिय़ों की उपलब्धि को भारतीय ओलंपिक संघ,संबंधित खेल संघ अपने-अपने वेब साइट पर लोड कर देंगे और एक माह या 15 दिन के अंदर आपत्ति आमंत्रित करने का अधिकार संबंधितों को होगा। इसके बाद बिना किसी सिफारिश के भारतीय ओलंपिक संघ पुरस्कार/सम्मान के हकदार खिलाड़ी/प्रशिक्षकों के नाम को भारत सरकार के खेल एवं युवा कल्याण विभाग को बिना किसी सिफारिश के सौंपेंगे आगे का निर्णय सरकार का होगा। खेल अवार्ड को लेकर होने वाले विवाद से बचने के लिए इस तरह के पारदर्शी व ठोस कदम उठाये जाने की आवश्यकता है। खिलाड़ी किसी सिफारिश  के आधार पर नहीं परंतु अपनी क्षमता व मेहनत के कारण भारत के लिए पदक जीतते हैं वे किसी के सिफारिश के मोहताज नहीं होते।