मड़वा प्रोजेक्ट की केपिटल लागत पर गंभीर सवाल : रमेश वर्ल्यानी
प्रोजेक्ट में 4 साल की देरी क्यों ?
लागत 6300 करोड़ रू. से बढ़कर 9000 करोड़ रू. क्यों ?
ब्याज दर 11 प्रतिशत से 13 प्रतिशत कैसे हो गई ?
 प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ प्रवक्ता एवं पूर्व विधायक रमेश वर्ल्यानी ने छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग के समक्ष मड़वा प्रोजेक्ट की केपिटल लागत के अनुमोदन एवं विद्युत दरों के निर्धारण को लेकर आयोजित जन-सुनवाई में जनरेशन कंपनी के क्रियाकलापों, भ्रष्टाचार एवं अनियमितताओं के लेकर जमकर प्रहार किए। उन्होंने कहा कि नियामक आयोग ने 1 जून, 2010 को मड़वा प्रोजेक्ट की लागत 6,317 करोड़ रू. निर्धारित की थी और प्रोजेक्ट पूरा करने की समय-सीमा चार वर्ष निर्धारित की थी। प्रोजेक्ट लागत के लिए लोन लिए जाने की ब्याज दर 11 प्रतिशत निर्धारित की गई थी। लेकिन आयोग के समक्ष जेनरेशन कंपनी ने अपनी याचिका में कहा है कि मड़वा प्रोजेक्ट पूरा करने में आठ साल लग गए और पूंजीगत लागत 6,317 करोड़ रू. से बढ़कर 9,000 करोड़ रू. हो गई जिसमें ब्याज-खर्च रू. 3,152 करोड़ रू. शामिल है। कंपनी की इस याचिका पर सवाल खड़ा करते हुए उन्होंने कहा कि कंपनी ने 9,000 करोड़ रू. की याचिका को नौ पृष्ठों में समेट कर मात्र खाना-पूर्ति करने का काम किया है। उन्होंने इस लागत की कोई आडिट-रिपोर्ट भी प्रस्तुत नहीं की है और न ही पूॅंजीगत लागत व्ययों का कोई विवरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि सीपत में एन टी पी सी ने 1980 मैगावाट का थर्मल पावर प्लांट स्थापित किया है जिसकी कुल लागत 6,777 करोड़ रू. आई है और 1000 मैगावाट प्लांट के मड़वा प्रोजेक्ट की लागत 9000 करोड़ रू. बताई जा रही है। यह अफसरों की घोर आपराधिक लापरवाही, अनियमितता एवं भारी भ्रष्टाचार का परिणाम है। यह बात भी हैरान करने वाली है कि ब्याज दर 11 प्रतिशत से बढ़कर 13 प्रतिशत कैसे हो गई जबकि पावर फायनेंस कार्पोरेशन ने अन्य विद्युत संयंत्रों को 7 प्रतिशत से 8 प्रतिशत की दर से लोन दिया है।
कांग्रेस प्रवक्ता श्री वर्ल्यानी ने कहा कि परियोजना में देरी के कारण बताए गए हैं कि जल संसाधन विभाग ने एनीकट बांध निर्माण में आठ साल लगा दिए तथा चांपा-जॉंजगीर क्षेत्र में अराजकता एवं वामपंथी अतिवादी प्रभाव तथा जन आंदोलन था। लेकिन ये स्वीकार योग्य नहीं है। क्योंकि दो सरकारी विभागों के बीच सामंजस्य के अभाव का खामियाजा राज्य की जनता भुगते- यह उचित नहीं है। मात्र 106 करोड़ रू. के बॉंध आदि के निर्माण में 8 वर्ष का समय लगने से परियोजना लागत लगभग 2700 करोड़ रू. बढ़ गई जिसका जिम्मेदार राज्य शासन है न कि जनता। यह सर्व विदित है कि चांपा – जांजगीर क्षेत्र में नक्सलवादी/वामपंथी अतिवादियों की सक्रियता नहीं है। जेनरेशन कंपनी द्वारा भू-विस्थापितों एवं प्रभावितों को न्यायपूर्ण मुआवजा नहीं मिलने से ही जन-असंतोष उत्पन्न हुआ। कंपनी द्वारा स्थानीय क्षेत्र के विकास की उपेक्षा एवं दायित्व पूरा करने में विफल होना भी जन-असंतोष का करण रहा। जन-प्रतिनिधि जनता के हितों की रक्षा के लिए उत्तरदायी है न कि जेनरेशन कंपनी के हितों के प्रति। जन आकांक्षाओं का समर्थन करना एवं उन्हें पूरा करने का प्रयास करना जन प्रतिनिधियों का दायित्व है। अतः परियोजना में देरी के लिए उन्हें भी उत्तरदायी ठहराना निहायत घिनौना प्रयास है जो निन्दनीय है। कुल मिलाकर जेनरेशन कंपनी अपनी अक्षमता और अकुशलता को छुपाने के लिए बहाने बना रही है और जाने-अनजाने में कंपनी के अधिकारी राज्य सरकार को ही कठघरे में खड़ा कर रही है।
डेढ़ माह में यूनिट ठप्प, 10 माह बंद
कांग्रेस नेता रमेश वर्ल्यानी ने कहा कि अक्षमता एवं अकुशलता की परकाष्ठा तब हुई जब मड़वा प्लांट (यूनिट-1) शुरू होने के मात्र डेढ़ माह के अंदर ठप्प हो गया और 10 माह से भी अधिक समय तक बंद रहा। इस बीच वितरण कंपनी को मंहगी बिजली खरीदकर आपूर्ति करनी पड़ी जिसका बोझ भी जनता पर पड़ा। इन विफलताओं के कारण मड़वा परियोजना की उत्पादन लागत वर्ष 2018-19 में रू. 5/- प्रति यूनिट तक पहुॅंचने की आशंका है। इतनी मंहगी बिजली का उत्पादन राष्ट्रीय संसाधनों  एवं जनता के धन का दुरूपयोग है।
उन्होंने अंत में आयोग के समक्ष अपनी आपत्ति प्रस्तुत करते हुए कहा कि कंपनी ने अपनी याचिका के साथ न तो आडिटेड बैलेंस-शीट प्रस्तुत की है और न ही चार्टड एकांउटेंट द्वारा प्रमाणित परियोजना लागत। कंपनी के सभी दावे संदेहास्पद है। कंपनी ने आपराधिक लापरवाही एवं भ्रष्टाचार कर, शासकीय राजस्व को क्षति पहुॅंचाई है। अतः आयोग स्वतः संज्ञान लेकर चार्टड एंकाउटेंट की टीम गठित कर, पूरे प्रोजेक्ट की विस्तृत जॉंच कराए। जॉंच में आर्थिक गड़बड़ी पाए जाने पर दोषी अफसरों की जवाबदेही तय कर उनसे वसूली की जाए तथा उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए जाएॅं।
(रमेश वर्ल्यानी)
वरिष्ठ प्रवक्ता एवं पूर्व विधायक