विनोद साव

यह अचम्भा है कि विनोद साव के उपन्यास ‘चुनाव’ और फिल्म ‘न्यूटन’ में अद्बुत साम्य है. उपन्यास के लिखाक विनोद साव जब भिलाई के मिराज थिएटर में अपने एक मित्र के साथ फिल्म ‘न्यूटन’ देख रहे थे. तब फिल्म देखते हुए मित्र ने कहा कि ‘ये फिल्म तो आपके उपन्यास चुनाव से काफी कुछ मिलती है. तब विनोद जी भी दो दशक पहले लिखे अपने उपन्यास के घटनाक्रम को याद करते हुए गौर से फिल्म को देखने लगे. फिल्म ‘न्यूटन’ में नक्सल प्रभावित बस्तर- दण्डकारण्य के एक संवेदनशील मतदान केन्द्र का जिक्र है. वर्ष १९९७ में प्रकाशित विनोद साव का व्यंग्य-उपन्यास चुनाव है जिसका ब्लर्ब ‘रागदरबारी’ जैसी कालजयी कृति के रचयिता श्रीलाल शुक्ल ने लिखा है और भूमिका आज के चर्चित व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी ने लिखी है. उपन्यास ‘चुनाव’ को लगातार तीन वर्षों तक पुरस्कार दिए गए हैं जिनमें मध्यप्रदेश हिंदी सहित सम्मलेन, भोपाल का वागीश्वरी सम्मान, लखनऊ का अट्टहास सम्मान और जमशेदपुर में जगन्नाथ राय शर्मा पुरस्कार क्रमशः : श्रीलाल शुक्ल, ड़ा.नामवर सिंह, खगेन्द्र ठाकुर और ड़ा.शिवकुमार मिश्र जैसे नामचीन लेखकों-समालोचकों के हाथों प्राप्त करने के सुयोग बने थे.

प्रख्यात कथाकार राजेंद्र यादव और कमलेश्वर के पीछे खड़े विनोद साव

जैसा कि निर्णायकों-समीक्षकों ने लिखा है कि ‘चुनाव जैसे बहुलिखित विषय पर कई उपन्यास लिखे गए हैं पर केवल मतदान प्रणाली का गहन पुनरीक्षण करता हुआ और लोकतंत्र के विद्रूप का विदग्ध शैली में विस्तार से चित्रण करता हुआ उपन्यास है ‘चुनाव’. इसी तरह भारत में होने वाले चुनाव पर कई फ़िल्में बनी हैं पर केवल मतदान प्रणाली और मतदान प्रक्रिया पर ही केंद्रित फ़िल्में सामान्यतः देखने में नहीं आईं. फिल्म ‘न्यूटन’ इसका एक बड़ा उदाहरण है और इसका फिल्मांकन अच्छा हुआ है. इसे सभी लोगों को देखना चाहिए.

विनोद साव के उपन्यास ‘चुनाव’ में ३१ अध्याय हैं जिनके सभी अध्याय छोटे हैं पर अंतिम दो अध्याय ३० और ३१ बड़े हैं जिसमें उपन्यास का एक चौथाई हिस्सा है. यह अचम्भा है कि फिल्म ‘न्यूटन’ की पटकथा और उनके फिल्मांकन का उपन्यास के अंतिम दो अध्यायों के चित्रण में साम्य है. दोनों में संवेदनशील क्षेत्रों की मतदान प्रक्रिया की दिक्कतों में समाहित लोकतंत्र के अनेक विद्रूप रूप एक समान सामने आए हैं.

सम्मान ग्रहण करते विनोद जी पत्नी चंद्रा साव के साथ

कथानक और फिल्मांकन में समानता है. फ़िल्म में  सरकारी कर्मचारियों की कहानी है जिसे छत्तीसगढ़ के हिंसा प्रभावित क्षेत्र में चुनावी ड्यूटी पर लगा दिया जाता है. बीहड़ इलाके में मतदान दल पर बीते घोर कष्ट, जर्जर स्कूल भवन में बने चुनाव बूथ, और पुलिस बल के दम पर करवाए गए मतदान के दृश्य उपन्यास ‘चुनाव’ के गांव बिहीटोला, स्कूल भवन और यहां रिज़र्व पोलिस फोर्स के दम पर हुए मतदान कर्म से काफी कुछ मिलते हैं.  इस फिल्म में छत्तीसगढ़ के विशेषकर रायपुर भिलाई के कई कलाकार शामिल हुए हैं जिन्होंने उपन्यास ‘चुनाव’ को पढ़ा भी होगा. कहा नहीं जा सकता कि कहाँ से कौन सी प्रेरणाएं काम कर गई हैं. फेसबुक और साहित्य समाज में यह चर्चा है कि ‘क्या यह फिल्म विनोद साव के उपन्यास पर आधारित है?’ आइये लेखकों पाठकों की कुछ टिप्पणियाँ देखें :

भिलाई के कवि पत्रकार ललित कुमार वर्मा का कहना है कि ‘हाँ.. इस फिल्म को देखते समय मुझे इन दृश्यों के देखे जाने या कथारूप में इसे कहीं पढ़े जाने का भ्रम बार बार हो रहा था. फिर याद आया कि विनोद साव का उपन्यास ‘चुनाव’ जिसे मैंने पढ़ा भी है. यह उस उपन्यास पर आधारित फिल्म है.  इसे महज संयोग कह कर टालना ठीक नही होगा, इसके लिए लेखक को अपना दावा रखना चाहिए. सही कह.रहे है विनोद भाई, इसे महज संयोग कह कर टालना ठीक नही होगा,’

भिलाई वाणी के सह-संपादक और कवि कृष्णमूर्ति ‘दीवाना’ कहते हैं कि ‘विनोद जी मेरे बेहद प्रिय लेखक हैं उनकी सभी पुस्तकों को मैंने खरीद कर पढ़ा है और अपने घर में सजाया है. मैंने फिल्म ‘न्यूटन’ देखकर विनोद जी को बताया कि फिल्म के दृश्य उनके उपन्यास के दृश्यों से काफी कुछ मिलते हैं.’

व्यंग्यकार गिरीश पंकज कहते हैं कि ‘कुछ करना चाहिए. फिल्म वाले ऐसे ही प्लाट कहीं से मारते हैं. मेरे उपन्यास ‘पालीवुड की अप्सरा’ से मिलती जुलती एक फिल्म  बनी थी ‘हीरोइन’.

विनोद साव का बहु-पुरस्कृत उपन्यास ‘चुनाव’

रायपुर के प्रसिद्द उपन्यासकार तेजिन्दर का कहना है कि ‘अगर ऐसा है तो लेखक को फिल्म निर्माताओं का पता लगाकर उनसे पूछना चाहिए.’

रायपुर की छत्तीसगढ़ी हिंदी लेखिका व देशबन्धु पत्रकार ड़ा. सुधा वर्मा कहती हैं ‘उपन्यास के कथानक और घटनाओं को कोई तो पढ़ा होगा, जिसने यह बात फिल्म के बनते समय उन घटनाओं को रखा होगा। बाद में फिल्म कि कहानी या घटनाओं में बदलाव किया गया होगा। कभी कभी ऐसा होता भी है कि एक ही घटना पर दो तीन लोग एक जैसा सोच लेते है। मेरी एक कविता ऐसी ही है जिसके भाव को एक कवियत्री ने ज्यों का त्यों रख लिया है।‘

राष्टीय पुस्तक न्यास, दिल्ली के संपादक लालित्य ललित का कहना है कि ‘उपन्यास के लेखक को पारिश्रमिक मिलना चाहिए.’

अजमेर के प्रभाशंकर उपाध्याय कहते हैं कि ‘स्क्रीन पर पूर्व में ही घोषणा हो जाती है कि कोई भी साम्य महज संयोग है। बताओ उनका क्या बिगाड़ लोगे?

नई दिल्ली की एक पत्रिका के उप संपादक प्रदीप कुमार का ये मानना है कि ‘अगर ऐसा है तो कुछ तो करना चाहिये .. यह तो चोरी है.’