क्षेत्रीय मीडिया की अवहेलना जारी, पड़ सकती हैं राजनीतिक दलों पर भारी

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लोकसभा 2019 में राज्य के राजनीतिक दलों का एक नया चेहरा इन दिनों छेत्री मीडिया को देखने को  मिल रहा है एक और जहां राजनीतिक दलों के मीडिया प्रभारिया की जिम्मेदारी निभाने वाले कार्यकर्ता अपने आप को केवल अपने पार्टी के राजनीतिक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर छपवाने व प्रेस कॉन्फ्रेंस करवाने तक ही सीमित रह गए हैं राजनीतिक पार्टियों के विज्ञापन राष्ट्रीय व राज्य के बड़े प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ही दिखाई पड़ रहे हैं क्षेत्रीय मीडिया को लगातार नजर अंदाज करने वाली इन राजनीतिक पार्टियों को शायद यह आभास नहीं की क्षेत्रीय मीडिया का अपने क्षेत्र में क्या महत्व होता है एक और जहां लगातार बड़े पूंजीवादी घरानों का मीडिया में प्रवेश वहीं लगातार छोटे व मझोले समाचार पत्रों सहित छोटे मीडिया का लगातार अपने आप में संघर्ष कर बाजार में बने रहना एक चुनौतीपूर्ण व कठिन कार्य है चुनाव के वक्त इन्हीं राजनीतिक पार्टियों के नेताओं द्वारा मीडिया को साथ में मिलकर एवं मीडिया से सहयोग की बात करते थकते नहीं है परंतु सत्ता प्राप्ति पश्चात वे अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेने में भी तनिक समय नहीं लगाते हैं उनके पार्टियों के मीडिया प्रभारी या यह कहें क्षेत्रीय मीडिया वालों के लिए मुखदर्शक की भूमिका निभाते हैं

यह सभी मीडिया प्रभारी या अपनी अपनी जिम्मेदारियों को एक दूसरे पर   थोपते नजर आते हैं अब तो आलम यह हो गया है कि यह बड़े कार्यकर्ता रूपी नेता बड़े-बड़े एसी के कमरों के पार्टी दफ्तरों से भी नहीं निकलते है email के माध्यम से अपनी बातें पहुंचाने मैं सफल हो जाते हैं अब तो समाचार पत्रों के मीडिया प्रतिनिधियों को भी भुलाया नहीं जाता है व्हाट्सएप के माध्यम से मैसेज डाल कर जानकारी दे दी जाती है अमूमन यह हाल सरकार में भी है क्षेत्रीय मीडिया का हाल इन दिनों पूरे देश में हाल बेहाल है लगातार घटती आबादी उन जिम्मेदार पाठकों के लिए भी जो सच्चाई को पढ़ाना चाहते हैं एक विचारणीय प्रश्न स हो गया है लगातार पूंजीवाद के कारण क्षेत्रीय मीडिया का हाल बेहाल है जिसका की पूरा लाभ राजनीतिक पार्टियां उठाने में कोई कमी नहीं कर रही है चाहे राजनीतिक पार्टी हो या फिर सरकारें लगातार छेत्री मीडिया को समाप्त करने की ओर वे आगे बढ़ रहे हैं

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क्षेत्रीय मीडिया की लगातार घटती संख्या बल उनके प्रकाशकों को सोचने पर मजबूर कर रही है एक और जहां पूंजीवाद से संघर्ष तो वही सरकार और राजनीतिक पार्टियों के रवैया को देख कर क्षेत्रीय मीडिया इन दिनों काफी मायूस है क्षेत्रीय मीडिया का आलम यह है कि वे अपने आप से बाजार में बने रहने के लिए प्रतिदिन संघर्ष कर रहे हैं क्षेत्रीय छोटे मीडिया को सीमित समझने वाले और सरकुलेशन के मापदंड को माप कर व्यवहार करने वाले राजनीतिक दलों व सरकारों को सोचना चाहिए कि अगर क्षेत्रीय मीडिया इस देश और राज्य से समाप्त हो जाएगी तो उनकी कला संस्कृति विचार उन तक पहुंचने वाला दूसरा माध्यम कौन होगा व जानकारियां भी समाप्त हो जाएगी l

मलय बनर्जी

बड़े मीडिया पूंजीवादी के हाथों में है तो वहीं पत्रकारिता के मापदंडों को लेकर संघर्ष का रास्ता चुनकर क्षेत्ररीता और पत्रकारिता के उच्च मापदंडों को लेकर संघर्ष करने वाले इन छेत्री मीडिया का कौन   रखवाला होगा या देखना बड़ा दिलचस्प होगा वहीं क्षेत्रीय मीडिया को भी अब अपना एक दायरा बना लेना चाहिए जिससे कि उन पर विश्वास व्यक्त करने वाले पाठकों को अपनी पीड़ा से वे अवगत करा सके आज के पूंजीवाद बाजारवाद भाई भतीजा बाद से निकल कर ऊपर उठकर वह किस तरह से संघर्ष का रास्ता अख्तियार कर पत्रकारिता के सिद्धांतों और मूल्यों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं इससे अवगत कराने का समय आ गया है अब क्षेत्रीय मीडिया को एक संगठित तौर पर एक साथ मिलकर अपनी आवाज बुलंद करने का समय आ चुका है अगर क्षेत्रीय मीडिया इस बात को समय रहते समझ गई तो वह दिन दूर नहीं जब पूंजीवाद का सहारा लेकर गोदी मीडिया का हम पर्दाफाश करने में सफल होंगे क्षेत्रीय मीडिया को आगे बढ़ने की शुभकामनाओं के साथ  मलय बनर्जी दैनिक साथी संदेश रायपुर दुर्ग एवं बिलासपुर से एक साथ प्रकाशित l

लेखक मलय बनर्जी वरिष्ठ पत्रकार है 

*ये लेखक के निजी विचार  हैं 

 

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