खेलो इंडिया: पहला राष्ट्रीय शालेय खेल: हरियाणा ने मारी बाजी

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का खेलो इंडिया शालेय खेलकूद के माध्यम से शहरी व ग्रामीण अंचल की प्रतिभाओं की खोज का सपना पूरा हो गया है। इसका श्रेय भारत के खेल मंत्री राज्यवद्र्धन सिंह राठौर को जाता है जिनके मार्गदर्शन की वजह से आज भारत की छिपी हुई युवा प्रतिभाएं सामने आ सकी हैं। आजादी के बाद से हमारा देश खिलाडिय़ों की विश्व स्तरीय उपलब्धियों के लिए तरस रहा है। केन्द्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के अगुवे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खेल की महत्ता को गंभीरता से लिया। वे इस तथ्य से सहमत थे कि हमारे देश में खेल प्रतिभाओं को उचित मंच नहीं मिल पाता है। यह सच भी है क्योंकि आज भारत की करीब 130 करोड़ की आबादी में 10 से 17 वर्ष तक उम्र के किशोर और युवाओं की संख्या लगभग 18 करोड़ है। इनमें से खेल प्रतिभाओं को चुनकर कम से कम आठ वर्ष तक प्रशिक्षित किये जाने का प्रावधान खेलो इंडिया कार्यक्रम में है। दिल्ली में संपन्न इस खेल समारोह का पहला संस्करण पूरी तरह सफल रहा है।

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हरियाणा राज्य के खिलाडिय़ों ने 38 स्वर्ण, 26 रजत, 38 कांस्य पदक के साथ पहला महाराष्ट्र ने 36 स्वर्ण, 32 रजत, 43 कांस्य के साथ दूसरा, दिल्ली ने 25 स्वर्ण, 29 रजत, 40 कांस्य के साथ तीसरा स्थान प्राप्त किया। इसी तरह पहले दस स्थानों में क्रमश: कर्नाटक, मणिपुर, उत्तरप्रदेश, पंजाब, केरला, तमिलनाडु, बंगाल की टीम रही। इनमें सिर्फ 32 लाख की आबादी वाले मणिपुर राज्य के प्रतिभाओं की उपलब्धि उल्लेखनीय है। खिलाड़ी से राजनेता बने भारत के खेल मंत्री राज्यवद्र्धन सिंह राठौर को यह पता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पदक प्राप्त करने के लिए एक खिलाड़ी को किन-किन कठिनाईयों के दौर से गुजरना पड़ता है। और इस स्तर पर पहुंचने के लिए खेल प्रतिभाओं को क्या-क्या मिलना चाहिए। प्रथम शालेय स्पर्धा में पदक प्राप्त करने वाले कई खिलाडिय़ों की उपलब्धि पर दृष्टि करने से स्पष्ट होता है उनकी प्रतिभा को अब तक उचित सम्मान नहीं मिला है। कुछ विजेता खिलाडिय़ों के जीवन की कहानी सुनकर हृदय द्रवित हो उठता है।

ओडि़सा के गंजाम जिले के 15 वर्षीय छात्र भक्तराम देस्ती गरीब किसान के पुत्र हैं। मणिपुर के 17 वर्षीय मुक्केबाज के पिता पेंटर हैं। उन्होंने रजत पदक जीता। मणिपुर की ही ग्रामीण अंचल की कोनसम ओर्मिला देवी ने 44 कि.ग्रा. भरोत्तोलन में पदक पाया, उनकी माता सब्जी विक्रेता हैं। 46 कि.ग्रा. ग्रीको रोमन कुश्ती में दूध विक्रेता के बेटे अर्शद ने स्वर्ण पदक जीता। राष्ट्रीय मंच पर इस तरह की प्रतिभाओं का शानदार प्रदर्शन स्पष्ट करता है कि भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं। बस अब उन्हें संवारने की आवश्यकता है। इसकी जिम्मेदारी केन्द्र सरकार ने पहले ही ले लिया है। प्रथम स्थान प्राप्त करने वालों को अगले पांच वर्षों तक 5 लाख रूपये सालाना छात्रवृत्ति दी जायेगी उन्हें खेल में व्यवस्थित प्रशिक्षण, खेल सामग्री, उचित खान-पान, पढ़ाई की सुविधा दी जायेगी। इस तरह भारत सरकार के इस कदम से 2024और 2028 में ओलंपिक खेलों में ढेरों पदक प्राप्त करने का सपना निश्चित रूप से पूर्ण होगा।

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