गो रुर्बन

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रोटी कपड़ा और मकान से भी पहले अगर कोई और तीन चीजों को प्राथमिकता अगर दी जानी चाहिए तो वो होगी ‘जल जंगल और ज़मीन’ इन्हीं तीन चीजों के आधार और अधिकार के लिए संगठन एकता परिषद पूरे देश में काम कर रहा है !
हाल ही में एकता परिषद ने अंश हैप्पीनेस सोसायटी के युवाओं के साथ मिलकर ‘रूर्बन’ कैम्प को अंजाम दिया है,
रूर्बन, रूरल और अर्बन शब्दों को जोड़कर बनाया गया है, लेकिन ये केवल शब्दों का जोड़ना नहीं हैं बल्कि
नदी के दो किनारों, दो विपरीत दिशाओं या फिर धरा और गगन को जोड़ना जैसे है,
रूर्बन एक प्रयास है शहरों को गांवों के खेत-खलिहानों से,कच्ची सड़कों से,चिड़ियों के चहचहाने से, 10-12 किलो मीटर दूर से लेकर आने वाले पानी से, दिन में 2-3 बार जगमगाने वाली बिजली से, अमलतास के फूलों से, बबूल के काँटों से, प्यासी मिट्टी में उभरी झुर्रियों से, अनाज की कमी से, पलायन से, सरकार की दिखावटी नीतियों से मिलाने का !
रूर्बन एक कोशिश है शहर के युवाओं को गांव की आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक सभ्यता को समझाने के लिए,
इस कार्यक्रम के माध्यम से, कुछ चुनिंदा यूवाओं को मौका मिलता है कि वो एकता परिषद और अंश हैप्पीनेस सोसायटी के माध्यम से किसी एक गांव में 4-6 दिन का शिविर कर सकें और वहां की चीज़ों को समझे वहां की परेशनियों को समझे, गांव वासियो को आत्म निर्भर बनाने का मार्गदर्शन करें, उनके साथ खड़े होकर उनके हक के लिए लगाई गई आवाज़ों की  गूंज बनें, उनमें हौसलों के तूफान को जगा दें ताकि वो अपने पैरों पर न केवल खड़ें हो बल्कि समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चल भी पाएं, हाल ही में रूर्बन प्रोजेक्ट का तीसरा शिविर मरा गांव में लगाया गया, यह गांव विकासखण्ड—— और जिला मुरैना के अंतर्गत आता है, इस गांव में लगभग 125-150 परिवार रहते होंगे, इस गांव में करीब 21 युवा देश के विभिन्न हिस्सों से आकर एकत्रित हुए, इनमे से कुछ कॉलेज के छात्र थे,कुछ स्कूल और कुछ नॉकरीपेशा, और कलाकार भी थे, इन सभी ने साथ मिलकर 4 दिन मरा गांव में बिताए, गांव के लोगो से बातें की समस्याएं देखी, सरकारी सहायताओं को असहाय स्तिथि को देखा, गौर से देखने पर कुछ गंभीर मुद्दे जैसे, गांव के हर दूसरे बच्चे को कुपोषण, सभी बच्चों में शिक्षा का अभाव, पीने के पानी की कमी, खाने के लिए अनाज़,रहने के लिए पक्की छत और अपनी खुद की ज़मीन के लिए संघर्ष निकलकर सामने आए, यह भी देखा गया कि सरकार ने यहां काम तो किया है लेकिन शायद उसका कोई फायदा नहीं या उसका कोई परिणाम नहीं निकला, आवास योजना के तहत पक्के मकान तो बनें हैं, पर उसमें अभी रहा नहीं जा सकता, 9-10 हैंडपम्प लगा दिए गए है जिनमें पानी शायद पिछले जन्म में आया रहा करता होगा, आंगनवाड़ी के अनुसार सातों दिन के लिए अलग अलग खाने की सूची है, पर बच्चों को खाना किसी एक दिन भी नसीब हो जाता है तो बच्चों के भाग खुल जाते हैं, स्कूल में वैसे तो नियुक्ति 4 शिक्षकों की है लेकिन एक ही शिक्षक समय पर पहुंच जाए तो बड़ी बात होती है, स्कूल को खोलना शायद उस शिक्षक के लिए उस खाली दुकान जैसा ही रह गया हो जिस दुकान में ग्राहक इसलिए नहीं जाते क्योंकि वहां कुछ मिलता ही नहीं!
इस मरा गांव में सहरिया आदिवासी काफी लंबे समय से बसे हुए हैं उनका डर उनकी बेबसी उनकी झुकी हुई कमर और धीमी, भरभराती आवाज़ में देखा जा सकता है, और गांव का एक बड़ा हिस्सा गुर्जरों का भी है, जिनकी अकड़ उनकी तनी हुई गर्दनों से महसूस की जा सकती है!
रूर्बन के इस गांव में करने से गांव वालों में एक विश्वास जागा वो इकठ्ठे हुए, जैसे किसी पुरानी किताब के बिखरे पन्नो को समेट कर पढ़ने योग्य बनाया गया हो!
जैसे तितर बितर यहां वहां बिखरे पोखरों को एक करके एक बडे  तालाब में तब्दील कर दिया हो, इन युवाओं के साथ मिलकर गांव वालों ने सरकारी नीतियों की त्रुटियों को खोजा उनके समाधान के लिए विचार किया, गांव का सही नक्शा तैयार किया जो कि अब तक शायद कहीं मौजूद ही नहीं था, गांव में बांध के निर्माण की सोच का अंकुर फूटा, आंगनवाड़ी में अधिकारियों की कवायद शुरू हुई, स्कूलों से मध्यान भोजन की ख़ुशबू आने लगी, 4 दिनों का शिविर करके ये 21 ये यूवा तो अपने अपने घर को चले गए लेकिन मरा गांव में जय जगत, नारी शक्ति, हम सब एक हैं, जैसे नारों की गूंज जरूर छोड़ गए, साथ ही बो गए एकता, साहस, उम्मीद, प्रयास, शांती और अधिकारों के कुछ बीज जिनमें जल्दी अंकुरण होगा, कोपलें फूटेंगी और मरा गांव में खुशियों का जंगल बनेगा, और बहुत घना बनेगा !

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