चेहरा , संगठन , रईसी सब कुछ है पर वोट नहीं ?

कैराना ,भंडारा –गोदिया , फूलपुर , गोरखपुर , अलवर ,अजमेर ,गुरुदासपुर , रतलाम । तो तो 8 सीट बीजेपी 2014 के बाद हार चुकी है । और शिमोगा-बेल्लरी लोकसभा सीट खाली पड़ी हैं । जहां जल्द ही उपचुनाव होंगे । तो 2014 में 282 से घटकर 272 पर आ गये । यानी लोकसभा के जादुई आंकड़े पर बीजेपी की सुई फिलहाल आ खड़ी हुई है । यानी 2019 की तरफ बढते कदम बताने लगे हैं कि बीजेपी अपने बूते सत्ता में आ नहीं पायेगी। तो उसे सहयोगी चाहिये। पर साथ खड़ी शिवसेना के सुर बताते है कि सबसे पुराना गठबंधन ही साथ रहना नहीं चाहता । तो क्या बीजेपी के लिये क्या ये खतरे की घंटी है कि 2019 का रास्ता बिना सहयोगियों के बनेगा नहीं । और सहयोगी ही गुस्से में है । मसलन नीतीश कुमार विशेष राज्य के मुद्दे पर नाराज हैं। रामविलास पासवान दलित मुद्दे पर गुस्से में हैं। दलित मुद्दे से लेकर दिल्ली के दलित बीजेपी संसाद उदितराज से लेकर यूपी के पांच बीजेपी सांसद तक नाराज है । तो क्या 2019 का रास्ता बीजेपी ने खुद अपने लिये ही मुश्किल भरा बना लिया है क्योंकि हिन्दुत्व का राग लिये वह मुस्लिम को अपना वोटर तक नहीं मानती । तो दलित के सामने बीजेपी अगड़ी और हिन्दू पार्टी हैं । और इन हालातों के बीच नया संदेश कैराना से लेकर गोदिया-भंडारा से निकला है। कैराना में गन्ना किसानों का सवाल भी था और एनकाउंटर में मारे जा रहे जाटों को लेकर भी है ।
सुंदर सिंह भाटी मारे गये । जो जाटो को लगा उनकी दबंगई पर भी हमला है । फिर ठाकुरवाद यूपी में इस तरह छाया है कि ऊंची जातियों में भी टकराव है । और महाराष्ट्र में शिवसेना भी टकरायी और गोदिया भंडारा में पटेल-पटोले एक साथ आ गये । तो क्या सिर्फ मोदी मोदी के नारे से काम चल जायेगा । या ये कहे कि यही वह शोर है जो नेता को लोकप्रिय चमकदार बनाता है । और पीछे दुनिया की सबसे बडी पार्टी बीजेपी है । संघ के स्वयंसेवकों की फौज है । तो फिर 2019 मुश्किल क्यों होगा । तो जिस बीजेपी के पास देश का सबसे चमकदार- सबसे लोकप्रिय चेहरा है । जिसका कोई विकल्प नहीं । और जो बीजेपी 10 करोड़ पार सदस्यों के साथ देश में सबसे बडा संगठन खड़ा कर चुकी है । कायदे से उसे तो हार मिलनी ही नहीं चाहिये। फिर एक के बाद प चुनाव में हार क्यों मिल रही है । तो क्या 2014 का चमकदार धारणा 2018 में ही बदलने लगी है। और 2019 की तरफ बढते कदम अभी से ये बताने लगे हैं कि संगठन या चेहरे के आसरे चुनाव लड़े जरुर जाते है । पर जीतने के लिये जो परसेप्शन होना चाहिये। वह परसेप्शन अगर जनता के बीच खत्म हो जाये तो फिर इंदिरा गांधी हो या राजीव गांधी या पिर अटल बिहारी वाजपेयी चमक काम देती नहीं है । कार्यकर्ता संगठन मायने रखता नहीं । क्योंकि इंदिरा गांधी तो नायिका थी . राजीव गांधी के पास तो दो तिहाई बहुमत था । और अटलबिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता के वक्त शाइनिंग इंडिया था । सब तो धरा का धरा रह गया । पर परसेप्शन बदल क्यो रहा है । जब मोदी फर्राटे से भाषण देते है । अमित शाह पन्ना प्रमुख तक को सांगठनिक ढांचे को खडा कर चुके है । और बीजेपी के पास फंड की भी कोई कमी नहीं है । और बाकि सभी को भ्रष्ट कहकर मोदी सत्ता ने इसी परसेप्शन को बनाया कि वह ईमानदार हैं। तो मोदी को ईमानदार कहने वालों के जहन में ये सवाल तो है कि आखिर 2014 में सबसे करप्ट राबर्ट वाड्रा को 2018 तक भी कोई छू क्यों नहीं पाया । फिर बीजेपी का परप्शशन सिर्फ पुराने अक्स भर का नहीं है । चुनाव जीतने के लिये दागी विपक्ष के नेताओं को साथ लेना भी गजब की सोशल इंजीनियरिंग रही । मुकुल राय हो या नारायण राणे या फिर स्वामी प्रसाद मोर्य । बीजेपी ने इन्हे साथ लेने में कोई हिचक नहीं दिखायी । और परसेप्शन बदलता है तो गोदिया के बीजेपी सांसद नाना पटोले ने किसान के नाम पर बीजेपी छोडी । कुमारस्वामी ने भविष्य पर दांव लगाया और काग्रेस के साथ खडे हो गये । और संयोग देखिये जिस पालघर से बीजेपी जीती वहा पर भी बीजेपी का उम्मीदवार पूर्व काग्रेसी सरकार में मंत्री रहे हुये है । दरअसल सच तो यही है कि बीजेपी के वोट कम हो रहे है । और बारीक लकीर को पकड़ियेगा तो जिस चकाचौंध की लकीर को 2014 में बीजेपी ने जीत के लिये और जीत के बाद खिंचा उसका लाभ उसे मिला है । मसलन वोट कम हो रहे है पर नोट कम नहीं हो रहे ।
एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में बीजेपी के पास फंडिग से 10 अरब 34 करोड 27 लाख रुपये आ गया । और देश की बाकि सभी पार्टियो के पास यानी काग्रेस समेत 38 राजनीतिक दलो के पास पंडिग हुई 8 अरब 45 करोड 93 लाख रुपये । यानी बीजेपी को लोकसभा में बहुमत मिला । राज्य दर राज्य बीजेपी को जीत मिलती चली गई तो देश के तमाम राजनीतिक दलो को मिलाकर हुई कमाई से भी दो अरब रुपये ज्यादा बीजेपी के फंड में आ गये । तो चुनावी जीत हार से इतर तीन सवालो का जवाब खोजिये । पहला , जो सत्ता में है उसे खूब पंड मिलता है । दूसरा , फंड देने वाले रुपये के बदले क्या चाहते होगें । तीसरा, इतना पैसा राजनीतिक दल करते क्या है । यानी हर चुनाव के बाद जब चुनाव आयोग ये बताता है कि उसने बांटे जा रहे सौ करोड जब्त कर लिये या कही हजार करोड जब्त हुये तो 2014 के बाद से देश में औसत नोटों की जब्ती हर चुनाव में 300 करोड तक आ बैठती है । यानी तीन अरब रुपये वोटरो को बांटने के लिये अलग अलग राजनीतिक निकले और जब्त हो गये । तो अगला सवाल है कि जो रुपया जब्त नहीं हुआ वह कितना होगा । और उससे आगे का सवाल जो सुप्रीम कोर्ट ने ही उठाया कि जो नोटो को बांटते हुये या ले जाते हुये पकडे गये लोगों के खिलाफ कार्रावाई क्यो नहीं होती । सजा क्यो नहीं मिलती । पर असल सवाल है कि 2014 के बाद से चुनाव का मतलब कैसे धनबल हो गया है यह चुनावी प्रचार के खर्च के आंकंड़ों से भी समझा जा सकता है और कारपोरेट समूह की राजनीति फंडिग और बैको से कारपोरेट समूह को कर्ज यानी एनपीए में तब्दिल होती रकम क्या ऐसा चक्रव्यूह है जिसमें भारतीय लेकतंत्र
फंस चुका है । क्योकि संयोग से जिन कॉरपोरेट हाऊस ने राजनीतिक दलों को चुनावी फंडिंग की या राजनीतिक दलो के खातों में दान दिया। उनमें से अधिकतर बैको से लोन लेकर ना लौटापाने के हालातों में आ चुके है। और बैंकों के घाटे को पूरा करने के लिये दो लाख करोड़ से ज्यादा सरकार दे चुकी है। तो क्या बैंकों का घाटा ।
एनपीए की रकम । बट्टा खाते में डालने का सच सबकुछ चुनावी लोकतंत्र से जा जुडा है जहां पार्टी के पास पैसा होना चाहिये । खूब रुपया होगा तो प्रचार में कोई कमी नहीं आयेगी । यानी चुनाव के वक्त सबसे मंहगा लोकतंत्र सबसे रईस हो जाता है । क्योंकि सबसे ज्यादा काला-सफेद धन चुनाव के मौके पर बाजार में आता है । और ध्यान दीजिये तो 2019 के चुनावी बरस में कदम रखने की शुरुआत हो चुकी है तो मोदी सरकार के चौथा बरस पूरा होते ही राज्य सरकारों ने अपना खजाना खोल दिया है। धुआंधार विज्ञापन हर राज्य सरकार केंद्र के पक्ष में यह कहते हुए दे रही है कि मोदी सरकार की योजनाओं ने गरीब की जिंदगी बदल दी। दूसरी तरफ कॉरपोरेट बीजेपी के साथ है ही। बीजेपी को 53 फीसदी चंदा सिर्फ दो दानदाताओं से से मिला। सत्या इलेक्ट्रोरल ट्रस्ट ने 251 करोड़ रुपए । -तो भद्रम जनहित शालिका ट्रस्ट ने 30 करोड़ रुपए चंदे में दिए । दरअसल सत्या इक्ट्रोरल ट्रस्ट में दो दर्ज से ज्यादा कॉरपोरेट है । भारती एयरटेल से लेकर डीएलएफ और इनओक्स या टोरेन्ट से लेकर जेके टायर या ओरियन्ट सिमेनट या गुजरात पेट्रोकैमिकल लिं. तक । और ऐसा नहीं है कि इस ट्रस्ट ने सिर्फ बीजेपी को फंड दिया । काग्रेस को भी 15 करोड़ 90 लाख रुपये दिये । यानी ये ना लगे कि कारपोरेट बीजेपी के सामने नतमस्तक है तो काग्रेस को भी चंद रुपये दे दिये गये । पर सवाल तो यही है कि राजनीतिक दलो के तमाम कारपोरेट राजनीतिक पंड देकर कौन सा मुनाफा बनाते कमाते है । और जो फंड नहीं देता क्या उसका नुकसान उसे भुगतना पडता है या फिर जिसकी सत्ता रेह उसके अनुकुल हर कोरपोरेट को चलना पडाता है । तो आखिरी सवाल क्या बीजेपी ने चाहे अनचाहे एक ऐसे हालात विपक्ष के लिये बना दिये है जहा वह बिना पंड के काम करना सीखे और कैराना में विपक्ष की एकजुटता ने देश की सबसे रईस पार्टी को मात दे दी । यहीं से आखिरी सवाल है कि क्या 2019 को लेकर 2014 का परसेप्शन इतना बदल रहा है कि अब कॉरपोरेट भी फंडिग शिफ्ट करेगा।
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पुण्य प्रसून वाजपेयी आज तक के पूर्व प्राइम टाइम एंकर और एग्जिक्यूटिव एडिटर थे. खबरों की दुनिया में पुण्य प्रसून वाजपेयी बेहद जाना पहचाना नाम है. इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट पत्रकारिता में 20 वर्षों से ज्यादा का अनुभव है. पुण्यय प्रसून को दो बार पत्रकारिता के प्रतिष्ठित इंडियन एक्सपप्रेस गोयनका अवार्ड से नवाजा गया है. पहली बार 2005-06 में हिंन्दी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में उनके योगदान के लिए उन्हें यह पुरस्कार दिया गया. दूसरी बार वर्ष 2007-08 में हिंदी प्रिंट पत्रकारिता के लिए गोयनका अवार्ड से नवाजा गया. यह पुरस्कार दो बार प्राप्त करने वाले वो एकमात्र पत्रकार हैं. पुण्य प्रसून वाजपेयी ने भारत के कई बड़े मीडिया घरानों के साथ काम किया है जिनमें जनसत्ता, संडे ऑब्जर्वर, संडे मेल, लोकमत व एनडीटीवी शामिल हैं. 2007-08 में पुण्य प्रसून वाजपेयी 8 महीनों के लिए सहारा समय चैनल से भी जुडे रहे. पुण्य प्रसून लाइव एंकरिंग की अपनी खास स्टाइल के चलते इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रसिद्ध हैं. दिसंबर 2001 में संसद भवन पर हुए आतंकी हमले की लगातार 5 घंटों तक लाइव एंकरिंग करने के लिए भी पुण्य प्रसून को खूब प्रसिद्धि मिली. पुण्य प्रसून वाजपेयी ने 6 किताबें भी लिखी हैं जिनमें ‘आदिवासियों पर टाडा’, ‘संसदः लोकतंत्र या नजरों का धोखा’, ‘राजनीति मेरी जान’, ‘डिजास्टरः मीडिया एंड पॉलिटिक्स’ शामिल हैं.

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