बन्द करिये तमाशा

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EDS PLS TAKE NOTE OF THIS PTI PICK OF THE DAY:::::::: Ghaziabad: A group of migrant workers walk to their villages amid the nationwide complete lockdown, on the NH24 near Delhi-UP Border in Ghaziabad, Thursday, March 26, 2020. The migrants, reportedly, started their journey to their villages in Uttar Pradesh on foot after they were left with no other option following the announcement of a 21-day lockdown across the country to contain the Covid-19, caused by the novel coronavirus. (PTI Photo/Ravi Choudhary)(PTI26-03-2020_000137A)(PTI26-03-2020_000258A)

बड़ा शोर मच गया है कि देश का मजदूर बेरोजगार हो गया है,उसके पास खाने के लिए खाना नही है, पीने के लिए पानी नही है।पैदल सैकड़ो किलोमीटर चल कर, घर जाना चाह रहा है,जा रहा है। पटरी में कट रहा है,दुर्धटना में मर रहा है। देश की मजदूर समर्थक राजनैतिक पार्टियां गाल बजा रही है। विदेश से लानेवाले लोगो ,कोटा से आनेवाले बच्चों के मामले में भी आपत्ति है। आपाधापी मची हुई है। सुविधा देने के नाम पर नगद देने का भी हल्ला है।

क्यो नगद दे?
ये प्रश्न भी तो जेहन में आना चाहिए?
ये भी प्रश्न उठना चाहिए कि मजदूर कौन है?
क्या वह किसान जिसके नाम और जमीन है बकायदा खेती करता है जो किसी राज्य में वह पंजीकृत किसान है उत्पादित कृषि सामग्री बेचता है।वह खेती काम का समय बीत जाने के बाद अंशकालीन मजदूर होता है।वह गोपनीय पलायन करता है। मेहनत करता है। मजदूरी के रूप में नगद पाता है।
पहले लॉक डाउन के बाद जिन मजदूरों ने विभिन्न राज्यो से पलायन करने का दुस्साहस किया था वे ऐसे ही अंशकालीन किसान कम मजदूर के साथ ही अघोषित रूप से वे लोग थे जो गरीबी के कारण ड्राइवर,सहयोगी के रूप में ट्रकों में हेल्पर,होटलो में,बिल्डिंग में,घरों में ,दुकानों में काम करने के लिए स्थाई रुप से अपना घर छोड़कर दूसरे शहरों में रह रहे थे अब वापस आ रहे है


लॉक डाउन के कठिन लेकिन अनिवार्य सोशल डिस्टेंसिंग की शर्त पर हर इंसान दूसरे इंसान से भयभीत है।सरकारे 50 %उपस्थिति के साथ काम कराने की छूट उद्योगों को दी हुई है लेकिन वातावरण में अनिश्चितता इतनी अधिक है कि उद्योगपति भी रिस्क नही ले रहे है। सबसे बड़ा पलायन विभिन्न औद्योगिक शहरों मे रह रहे स्थाई मजदूरों का भी हो रहा है जो बरसो पहले निजी उद्योगों में काम के लिए उसी शहर के बाशिन्दे हो गए थे।
23 मार्च के पहले तक सब कुछ ठीक था। पलायन करने वाले मजदूरों को दूसरे राज्यों में बेहतर आमदनी होती है। ये किसी से छिपा नही है। संघटित क्षेत्र के मजदूरों की आय साधारण इंजीनियरिंग कॉलेज से पास विद्यार्थी को मिल रहे 15 हज़ार से अधिक है। वे पहले औऱ दूसरे लॉक डाउन के फेज ने भी संयम बरते थे लेकिन तीसरे लाक डाउन ने इनके भी धैर्य को तोड़ दिया। रायपुर शहर के औद्योगिक क्षेत्र बिरगांव,उरला,तर्रा ,सिलतरा में बिहार के दक्ष मजदूर भी वापस जाने के लिए आतुर है या चला भी गया होगा।
अब प्रश्न उठता है भुगतान का। निजी क्षेत्र में व्यापार केवल लाभ के लिये किया जाता है। हानि जैसा शब्द व्यापारियों के डायरी में ये शब्द होना ही गुनाह है। इससे बचने के लिए वे सदियों से टैक्स चोरी,औऱ मजदूरो का शोषण करते आये है। कम ख़र्च में अधिक लाभ लेना हो तो आप इनसे प्रशिक्षण ले सकते है। प्रधानमंत्री जी ने पहले लॉक डाउन की जो घोषणा की थी उसमें मार्मिक अपील भी की थी लेकिन ये चिचोरी साबित हुई ।बहुत बडेऔद्योगिक परिवारों को छोड़ दिया जाए तो काइया व्यापारी बहुमत में है। एक महीने में औकात दिख गई।ऊपर से न्यायालय ने भी मुहर लगा दिया कि काम नही तो वेतन नही का सिद्धांत तो सरकारी सेवा में है फिर निजी क्षेत्र से उम्मीद क्यों?


आज जो भीषण घर वापसी हो रही है उसका सबसे बड़ा कारण है आर्थिक अनिश्चितता है,सामाजिक असुरक्षा है। सरकारों ने गरीबो के घर पर खाने की व्यवस्था अगले चार महीने के लिए कर दिया है,चाँवल, गेहू, शक्कर, दाल, नमक, गैस सिलेंडर,500 रुपये छोटी मोटी जरूरतों के लिए दे ही दिया है। भूपेश बघेल जी ने 10 हज़ार रुपये किसानों के खाते में डलवा दिए है। अब इसके बाद नगद देने का तर्क समझ से परे है। क्या जो मजदूर पलायन कर रहा है वह वर्षों से बिना मजदूरी के काम कर रहा था? क्या उसके पास जमा पूंजी नही है? सोचने की बात है।
सहयोग हो लेकिन इतना भी नही कि लाद दे लदा दे घर तक पहुँचा दे का सिद्धांत लागू हो जाये। ये देश ऐसे ही राजनैतिक पार्टियों के द्वारा दिए जाने वाले असीमित सुविधाओ के कारण मेहनत करने वालो को अलाल बना चुका है।42 करोड़ परिवार सालो से गरीब है उंसे डर है कि अगर वह मेहनत करता है तो सुविधाओ से वंचित हो जाएगा।
मुफ्त, एक ऐसा नायाब नुस्खा है कि हर कोई लाभान्वित होना चाहता है।इस कारण गरीब बनने की होड़ है। वास्तविक गरीबो में तीन चौथाई गरीब ऐसे ही है कृतिम जिनको सरकारे ढो रही है।

हर सरकार ढोल पीटती है कि उसके राज्य से पलायन,बंधुवा मजदूरी जैसी समस्या नही है,अगर ये बाते सच थी तो ये सैलाब किसकी देन है? बहुत पहले अपराधों में कमी लाने का नायाब नुस्खा खोजा गया था एफआईआर लिखो मत। ऐसे ही पलायन के आंकड़े ही मत रखो, अब सर पर परेशानी खड़ी हो गई है तो आरोप प्रत्यारोप चल रहा है।
नगद देने का निर्णय औचित्यपूर्ण नही है अब बैंक से भी पैसा न निकाले तो क्या करेंगे। औऱ मुफ्त के पैसे का उपयोग कैसे हो रहा है इसे देखना चाहते हैं तो किसी शराब की दुकान के सामने से गुजर जाइये।
सबसे जरूरी काम अभी जो है वह है मजदूरो को व्यवस्थित ढंग से उनके घर तक पहुँचाने की हो। राज्य सरकारों से रेल्वे विभाग समन्वय बनाये।सारे स्कूल की बसे अधिग्रहित की जाए और पैदल चलने, की मजबूरी से निजात दिलाते हुए ट्रकों, ट्रालियों में जानवर समान लादने की अमानवीय तरीके बंद हो।

#संजयदुबे

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