मोहल्ला महोत्सव

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खिड़कियों से हवा का झोंका आया तो कमरा मोहल्लाछाप गन्ध से भर गया जिसमें घूरे और नाली के संयुक्त गठबन्धन की गन्ध स्पष्ट थी।  गठबन्धन की राजनीति से मोहल्ले के घूरे और नाली भी अपने आपको नहीं बचा पाए थे।  इसलिए कभी शहर का सबसे खूबसूरत माना जाने वाला यह मोहल्ला भी उस क्षुद्र राजनीति का शिकार हो गया था जिसकी बजबजाती गन्दगी पूरे व्यवस्था में सड़ान्ध पैदा कर रही है।
इस प्रदूषण के भभके से घर के सदस्यों को बचाने के लिए मैंने खिड़की बन्द करने की कोशिश की तो बाहर से किसी के गाने की आवाज आई।  थोड़ी देर में वह गायक कलाकार सशरीर ड्राइंगरुम में घुस आया।  मैंने देखा वे मोहल्ले के समाजसेवी साहूजी हैं।  उन्होंने अब भी अपना गाना जारी रखा ’मेरी गलियों में न रखेंगे कदम आज के बाद…..।’
मैंने कहा ’आप गाते हैं तो ठीक से गाइए .. और तेरी गली को मेरी गली मत बतलाइए।’
वे बोले ’जैसे देश और उसकी राजनीति में उल्टी गंगा बह रही है।  वैसे ही हमारे मोहल्ले की नाली भी अब उल्टी बह रही है।  सीधी बहने वाली नाली अपने रास्ते जाती है पर जब वह उल्टी बहती है तब सड़क पर आ जाती है,  गलियों में फेैल जाती है।  जब बजबजाती नाली की अंतहसलिला उल्टी धार बहेगी तो मोहल्ले में रहने वालों का गाना बजाना भी उल्टा ही चलेगा।  इसलिए हम गा रहे हैं कि ’मेरी गलियों में ना रखेंगे कदम आज के बाद ..।’
मैंने कहा ’आप इस उल्टी गंगा का राज कहिए?’  तो वे बोले कि ’मतलब साफ है। मोहल्ले की सारी नालियाॅ आज सड़क पर आ गई है।  सब तरफ नालियों का कालाचिट्टा पानी बह रहा है उसकी बदबू फैेल गई है।  मेरी गली में चलकर आप देखें तो वहाॅ पाॅव रखने की जगह नहीं है।  ऐसे में हमने गाना बिल्कुल ठीक गाया है।’
’तो अब आपका क्या विचार है?’  मैंने टोह ली तो वे बोले ’जब सब कुछ उल्टा पुल्टा चल रहा है तो हम समझते हैं कि चलिए हम सब अपने मोहल्ले की गन्दगी को ही हाइलाईट करें।  जिनके पास अच्छा अच्छा है तो अपने अच्छे का प्रदर्शन कर रहे है लेकिन हमारी किस्मत में कचरों का पहाड़, नालियों की गंगा-जमुना, अन्धेरों का साम्राज्य, सड़कों पर चाॅंद की तरह दाग व गड्ढे, धूल गुबार का वैभव और लाउड स्पीकरों का शंखनाद है।  मैं कहता हूं कि यह कीर्तिमान भी क्या कम है।  शहर में गन्दगी का यह आलम कितने शहरों को मयस्सर है।  अपनी बदनसीबी को ही हम खुशनसीबी मान लें जो ये दिन देखने को मिल रहे हैं।’
अपने मोहल्ले का जीवन्त चित्र खींच लेने की उनकी कला से मैं प्रभावित हुआ।  उनका हौसला बढ़ाते हुए मैंने कहा ’बहुत खूब.. तो फिर क्या सोचा है आपने.. हो जाए!’
’हो जाए ! इस बार तो मोहल्ला महोत्सव हो जाए।’  वे उत्साह से भर उठे ’सेलीब्रेट करने के लिए अपने पास कोई कम आइटम नहीं है।  नया साल अभी ज्यादा पुराना नहीं हुआ है.. बसंत की बयार बह रही है और होली हुड़दंग भी सामने है।  मोहल्ले की गन्दगी को हम बढ चढ़कर बतावेंगे तो कुछ न कुछ तो हो ही जाएगा।’
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हिंदी व्यंग्य के सुस्थापित लेखक विनोद साव ने अनेक उपन्यास, कहानियाँ, संस्मरण और यात्रावृत्तांत लिखे हैं. उनकी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं. उनकी रचनाएँ हंस, पहल, वसुधा, अक्षरपर्व, ज्ञानोदय, वागर्थ और समकालीन भारतीय साहित्य में छपी हैं. उन्हें वागीश्वरी और अट्टहास सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं. वे उपन्यास के लिए ड़ा.नामवर सिंह और व्यंग्य के लिए श्रीलाल शुक्ल से भी सम्मानित हुए हैं. उनके नियमित स्तंभ का नाम रहेगा 'मैदान-ए-व्यंग्य'. लीजिए प्रस्तुत है उनकी पहली रचना 'बारिश और दंगा.'

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